संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कहकर उन्होंने उनका नाम 'लम्बोदर' रख दिया। देवसमुदायसे घिरे हुए महेश्वरने कहा—'बेटा! तुम्हारा नृत्य होना चाहिये।' यह सुनकर उन्होंने अपने घूँघुरकी आवाजसे ही शंकरजीको संतुष्ट कर दिया। इससे प्रसन्न होकर शिवने अपने पुत्रको गणेशके पदपर अभिषिक्त कर दिया। जो एक हाथमें विघ्नपाश और दूसरे हाथसे कंधेपर कुठार लिये रहते हैं तथा पूजा न पानेपर अपनी माताके कार्यमें भी विघ्न डाल देते हैं, उन विघ्नराजके समान दूसरा कौन है। जो धर्म, अर्थ और काम आदिमें सबसे पहले पूजनीय हैं तथा देवता और असुर भी प्रतिदिन जिनकी पूजा करते हैं, जिनके पूजनका फल कभी नष्ट नहीं होता, उन प्रथम-पूजनीय गणेशको हम पहले मस्तक नवाते हैं। जिनकी पूजासे सबको प्रार्थनाके अनुरूप सब प्रकारके फलकी सिद्धि दृष्टिगोचर होती है, जिन्हें अपने स्वतन्त्र सामर्थ्यपर अत्यन्त गर्व है, उन बन्धुप्रिय मूषकवाहन गणेशजीकी हम स्तुति करते हैं। जिन्होंने अपने सरस संगीत, नृत्य, समस्त मनोरथोंकी सिद्धि तथा विनोदके द्वारा माता पार्वतीको पूर्ण संतुष्ट किया है, उन अत्यन्त संतुष्ट हृदयवाले श्रीगणेशकी हम शरण लेते हैं।
इस प्रकार देवताओंके स्तवन करनेपर गणेशजीने उनसे कहा—'देवताओ! अब तुम्हारे यज्ञमें विघ्न नहीं पड़ेगा।' जब देवयज्ञ निर्विघ्न पूरा हो गया तब गणेशजीने उन देवताओंसे कहा—'जो लोग इस स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक मेरी स्तुति करेंगे, उन्हें कभी दरिद्रता और दुःखका सामना नहीं करना पड़ेगा। जो इस तीर्थमें आलस्य छोड़कर भक्तिपूर्वक स्नान और दान करेंगे, उनके शुभ कार्य निर्विघ्न सिद्ध होंगे। इस बातका आपलोग भी अनुमोदन करें।' उनके इतना कहनेके साथ ही देवताओंने एक स्वरसे कहा—'ऐसा ही होगा।' यज्ञ समाप्त होनेपर देवता अपने-अपने स्थानको चले गये। तबसे वह तीर्थ 'अविघ्न तीर्थ' कहलाने लगा। वह मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा सम्पूर्ण विघ्नोंको मिटानेवाला है।
अविघ्नतीर्थके बाद शेषतीर्थ है, वह भी समस्त अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है। मैं उसके स्वरूपका वर्णन करता हूँ। रसातलके स्वामी महानाग शेष सम्पूर्ण नागोंके साथ रसातलमें रहनेके लिये गये। परंतु राक्षसों, दैत्यों और दानवोंने, जिनका रसातलमें पहलेसे ही प्रवेश हो चुका था, नागराजको वहाँसे निकाल दिया। तब वे मेरे पास आकर बोले—'भगवन्! आपने राक्षसोंको तथा हमलोगोंको भी रसातल दे रखा है, किंतु दैत्य और राक्षस हमें वहाँ स्थान नहीं देना चाहते; इसलिये आपकी शरणमें आया हूँ।' तब मैंने नागसे कहा—'तुम गौतमीके तटपर जाओ, वहाँ महादेवजीकी स्तुति करनेसे तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। उनके सिवा दूसरा कोई तीनों