भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 201
  • मातृतीर्थ, अविघ्नतीर्थ और शेषतीर्थकी महिमा * १९९

भागने लगे। युद्ध करते समय शंकरजीके ललाटसे पसीनेकी बूँदें गिरने लगीं। वे बूँदें जहाँ-जहाँ गिरीं, वहाँ-वहाँ शिवके आकारकी ही माताएँ प्रकट हो गयीं। वे भगवान् महेश्वरसे बोलीं— 'आप आज्ञा दें तो हम सब असुरोंको खा जायँ।' तब देवताओंसे घिरे हुए भगवान्ने कहा—'शत्रु जहाँ-जहाँ जायँ, सर्वत्र उनका पीछा करो। इस समय वे मेरे डरसे रसातलमें जा पहुँचे हैं। तुम भी रसातलतक उनके पीछे-पीछे जाओ।' यह आज्ञा पाकर सब माताएँ पृथ्वी छेदकर रसातलमें गयीं और अत्यन्त भयंकर दैत्यों तथा दानवोंका संहार करके फिर उसी मार्गसे देवताओंके पास लौट आयीं। माताओंके जानेसे लौटनेतक देवता गौतमीके तटपर खड़े रहे। लौटनेपर देवताओंने माताओंको वर दिया—'संसारमें जिस प्रकार शिवकी पूजा होती है, उसी प्रकार माताओंकी भी हो।' यों कहकर देवता अन्तर्धान हो गये और माताएँ वहीं रह गयीं। जहाँ-जहाँ वे देवियाँ स्थित हुईं, वह सब स्थान मातृतीर्थ माना जाता है। वे सभी तीर्थ देवताओंके लिये भी सेव्य हैं, फिर मनुष्य आदिके लिये तो बात ही क्या है। शिवजीके कथनानुसार उन तीर्थोंमें किया हुआ स्नान, दान और तर्पण—सब अक्षय होता है। जो मनुष्य मातृतीर्थोंके इस उपाख्यानको प्रतिदिन सुनता, स्मरण रखता और पढ़ता है, वह दीर्घायु और सुखी होता है।

मातृतीर्थके अनन्तर अविघ्नतीर्थ है, जो सब विघ्नोंका नाश करनेवाला है। नारद! वहाँका वृत्तान्त भी बतलाता हूँ, भक्तिपूर्वक सुनो। "एक बार गौतमीके उत्तर-तटपर देवताओंका यज्ञ आरम्भ हुआ, किन्तु विघ्न-दोषके कारण उसकी समाप्ति नहीं हुई। तब सब देवताओंने मुझसे और भगवान् विष्णुसे इसका कारण पूछा। उस समय मैंने ध्यानस्थ होकर कारणका पता लगाया और कहा—'इसमें गणेशजी विघ्न डाल रहे हैं। इसीलिये इस यज्ञकी समाप्ति नहीं हो पाती। अतः सब लोग आदिदेव विनायककी स्तुति करें।' मेरा आदेश पाकर सब देवता गौतमीमें स्नान करके आदिदेव गणेशकी भक्तिपूर्वक स्तुति करने लगे।

देवता बोले—सदा सब कार्योंमें सम्पूर्ण देवता तथा शिव, विष्णु और ब्रह्माजी भी जिनका पूजन, नमस्कार और चिन्तन करते हैं, उन विघ्नराज गणेशकी हम शरण लेते हैं। विघ्नराज गणेशके समान मनोवाञ्छित फल देनेवाला कोई देवता नहीं है, ऐसा निश्चय करके त्रिपुरारि महादेवजीने भी त्रिपुरवधके समय पहले उनका पूजन किया था। जिनका ध्यान करनेसे सम्पूर्ण देहधारियोंके मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं, वे अम्बिकानन्दन गणेश इस महायज्ञमें शीघ्र ही हमारे विघ्नोंका निवारण करें। 'देवी पार्वतीके चिन्तनमात्रसे ही गणेशजी-जैसा पुत्र उत्पन्न हो गया। इससे सम्पूर्ण जगत्में महान् उत्सव छा गया है।' यह बात उन देवताओंने अपने मुखसे कही थी, जो नवजात शिशुके रूपमें गणेशजीको नमस्कार करके कृतार्थ हुए थे। माताकी गोदमें बैठे हुए और माताके मना करनेपर भी उन्होंने पिताके ललाटमें स्थित चन्द्रमाको बलपूर्वक पकड़कर उनकी जटाओंमें छिपा दिया, यह गणेशजीका बालविनोद था। यद्यपि वे पूर्ण तृप्त थे तो भी अधिक देरतक माताके स्तनोंका दूध इसलिये पीते रहे कि कहीं बड़े भैया कार्तिकेय भी आकर न पीने लगें। उनकी बुद्धिमें बालस्वभाववश भाईके प्रति ईर्ष्या भर गयी थी। यह देखकर भगवान् शंकरने विनोदवश कहा—'विघ्नराज! तुम बहुत दूध पीते हो, इसलिये लम्बोदर हो जाओ।' यों