भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

२६- राजा ज्यामघका युद्धमें जीती हुई राजकन्याको पुत्रवधूके रूपमें अपने स्त्रीको देना

४२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


सुभद्राके नामसे विख्यात हुई। वसुदेवके देवकीके गर्भसे महायशस्वी भगवान् श्रीकृष्ण अवतीर्ण हुए। बलरामके रेवतीके गर्भसे निशठ उत्पन्न हुए, जो माता-पिताके बड़े लाड़ले थे। सुभद्राके अर्जुनके सम्बन्धसे महारथी अभिमन्यु उत्पन्न हुआ। वसुदेवजीकी परम सौभाग्यशालिनी सात पत्नियोंसे जो पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम बतलाता हूँ; सुनो। शान्तिदेवाके भोज और विजय, सुनामाके वृकदेव और गद तथा त्रिगर्तराजकन्या वृकदेवीके महात्मा अगावह नामक पुत्र हुए।

क्रोष्टुके एक और पुत्र महायशस्वी वृजिनीवान् हुए। उनके पुत्र स्वाहि थे। स्वाहिके पुत्र राजा उषद्गु हुए, जिन्होंने प्रचुर दक्षिणावाले अनेक महायज्ञोंका अनुष्ठान किया था। उषद्गुके पुत्र चित्ररथ हुए, चित्ररथके शशबिन्दु, शशबिन्दुके पृथुश्रवा, पृथुश्रवाके अन्तर, अन्तरके सुयज्ञ तथा सुयज्ञके उषत् हुए। उषत्‌का अपने धर्मके प्रति बड़ा आदर था। उषत्‌के पुत्र शिनेयु, शिनेयुके मरुत्, मरुत्‌के कम्बलबर्हिष्, कम्बलबर्हिष्‌के रुक्मकवच, रुक्मकवचके परजित् तथा परजित्‌के पाँच पुत्र हुए—रुक्मेषु, पृथुरुक्म, ज्यामघ, पालित तथा हरि। पालित और हरिको पिताने विदेह प्रान्तकी रक्षामें नियुक्त कर दिया। रुक्मेषु पृथुरुक्मकी सहायतासे राजा हुए। इन दोनों भाइयोंने राजा ज्यामघको घरसे निकाल दिया। तब वे वनमें आश्रम बनाकर रहने लगे। उस समय शान्तिपरायण राजाको ब्राह्मणोंने बहुत कुछ समझाया। तब वे धनुष लेकर रथपर आरूढ हो दूसरे देशमें गये। अकेले ही नर्मदाके तटपर जाकर उन्होंने मेकला, मृत्तिकावती तथा ऋक्षवान् पर्वतको जीतकर शुक्तिमती नगरीमें निवास किया। ज्यामघकी पत्नी शैब्या थी, जो पतिव्रता होनेके साथ ही बड़ी प्रबल थी। यद्यपि राजाको कोई पुत्र नहीं था, तथापि उन्होंने पत्नीके भयसे दूसरी स्त्रीसे विवाह नहीं किया। एक बार किसी युद्धमें विजयी होनेपर उन्हें एक कन्या मिली। उसे रथपर बैठी देख स्त्रीने पूछा—'यह कौन है?' तब वे डरकर बोले—'यह तुम्हारी पुत्रवधू है।' यह सुनकर रानी बोली—'मेरे तो कोई पुत्र नहीं, फिर यह किसकी पत्नी होनेसे पुत्रवधू हुई?' यह सुनकर ज्यामघने कहा—'तुम्हें जो पुत्र उत्पन्न होगा, उसके लिये यह पत्नी प्रस्तुत की गयी है।' तत्पश्चात् रानी शैब्याने कठोर तपस्या करके एक विदर्भ नामक पुत्र उत्पन्न किया। उसका विवाह उक्त राजकन्यासे हुआ। उसके गर्भसे क्रथ और कौशिक नामक पुत्र उत्पन्न हुए। वे दोनों बड़े ही शूर तथा युद्धविशारद थे। उसके बाद विदर्भके भीम नामक पुत्र हुआ। उसके पुत्रका नाम कुन्ति हुआ। कुन्तिसे धृष्टका जन्म हुआ, जो संग्राममें धृष्ट और प्रतापी था। धृष्टके आवन्त, दशार्ह तथा विषहर नामक तीन पुत्र हुए, जो बड़े धर्मात्मा और शूरवीर थे। दशार्हके व्योमा और व्योमाके

* क्रोष्टु आदिके वंशका वर्णन तथा स्यमन्तकमणिकी कथा * ४३

पुत्र जीमूत बतलाये जाते हैं। जीमूतके विकृति, विकृतिके भीमर्थ, भीमर्थके नवरथ और नवरथके पुत्र दशरथ हुए। दशरथके पुत्रका नाम शकुनि था। शकुनिसे करम्भ तथा करम्भसे देवरातका जन्म हुआ। देवरातके पुत्र देवक्षत्र तथा देवक्षत्रके महायशस्वी वृद्धक्षत्र हुए। वे देवकुमारके समान कान्तिमान् थे। इनके सिवा मधुरभाषी राजा मधुका भी जन्म हुआ, जो मधुवंशके प्रवर्तक थे। मधुके उनकी पत्नी वैदर्भीसे नरश्रेष्ठ पुरुद्वान्की उत्पत्ति हुई। मधुकी दूसरी पत्नी इक्ष्वाकुवंशकी कन्या थी। उससे सर्वगुणसम्पन्न सत्त्वान् हुए, जो सात्त्वत कुलकी कीर्तिको बढ़ानेवाले थे।

सत्त्वान्से सत्त्वगुणसम्पन्ना कौसल्याने भजमान, देवावृध, अन्धक तथा वृष्णि नामक पुत्र उत्पन्न किये। इनके चार कुल यहाँ विस्तारपूर्वक बतलाये गये हैं। भजमानके दो स्त्रियाँ थीं। एकका नाम था बाह्यकसृञ्जयी और दूसरीका उपबाह्यकसृञ्जयी। उन दोनोंके गर्भसे बहुत-से पुत्र हुए। क्रिमि, क्रमण, धृष्ट, शूर तथा पुरञ्जय—ये भजमानके बाह्यकसृञ्जयीसे उत्पन्न हुए पुत्र थे। अयुताजित्, सहस्राजित्, शताजित् और दासक—ये भजमानद्वारा उपबाह्यकसृञ्जयीके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र थे। राजा देवावृध यज्ञपरायण रहते थे। उन्होंने सर्वगुणसम्पन्न पुत्र होनेके उद्देश्यसे भारी तपस्या की। तपस्यामें संलग्न होकर वे पर्णाशाके जलका आचमन करते थे। सदा ऐसा ही करनेके कारण उस नदीने उनका प्रिय करना चाहा। कल्याणमय नरेश देवावृधके अभीष्टकी सिद्धि कैसे हो—इस चिन्तामें देरतक पड़ी रहनेपर भी पर्णाशा सहसा किसी निश्चयपर न पहुँच सकी। उसे ऐसी कोई स्त्री नहीं मिली, जिसके गर्भसे वैसा सुयोग्य पुत्र उत्पन्न हो सके। तब उसने यह निश्चय किया कि मैं स्वयं ही चलकर इनकी सहधर्मिणी बनूँगी। यह विचारकर पर्णाशाने एक परम सुन्दरी कुमारीका रूप धारण करके राजाको पतिरूपमें वरण किया। राजाने भी उसकी कामना की। तदनन्तर उन उदारबुद्धि नरेशने उसमें एक तेजस्वी गर्भकी स्थापना की। तत्पश्चात् दसवें महीनेमें पर्णाशाने देवावृधके सर्वगुणसम्पन्न पुत्र बभ्रुको जन्म दिया। इस वंशके विषयमें पुराणोंके ज्ञाता देवावृधके गुणोंका बखान करते हुए निम्नाङ्कित प्रसिद्ध गाथाका गान करते हैं। 'हम जैसे आगे देखते हैं, वैसे ही दूर और निकट भी देखते हैं। हमारी दृष्टिमें बभ्रु सब मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और देवावृध तो देवताओंके तुल्य हैं। बभ्रु और देवावृधके सम्पर्कमें आकर एक हजार चौहत्तर मनुष्य अमृतत्वको प्राप्त हो चुके हैं।'

बभ्रुका वंश बहुत बड़ा था। उसमें सब-के-सब यज्ञपरायण, महादानी, बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त तथा सुदृढ़ आयुध धारण करनेवाले थे। मृत्तिकावतीपुरीमें भोजवंशके क्षत्रिय रहते थे। अन्धकसे काश्यकी कन्याने चार पुत्र प्राप्त किये—कुकुर, भजमान, शशक और बलबर्हिष्। कुकुरके पुत्र वृष्टि, वृष्टिके कपोतोरोमा, कपोतोरोमाके तित्तिरि, उसके पुनर्वसु, पुनर्वसुके अभिजित् तथा अभिजित्के आहुक एवं श्राहुक नाम दो जुड़वाँ पुत्र हुए। इनके विषयमें ऐसी गाथा प्रसिद्ध है—'आहुक किशोरावस्थाके समान आकृतिवाले थे। वे अस्सी कवच धारण किये हुए अपने श्वेतवर्णवाले परिवारके साथ पहले यात्रा करते थे। जो भोजवंशी आहुकके दोनों ओर चलते थे, उनमेंसे कोई ऐसा नहीं था, जो पुत्रवान् न हो, सौसे कम दान करता हो, हजार या सौसे कम आयुवाला हो, अशुद्ध कर्म करता हो अथवा यज्ञ न करता हो। भोजवंशी आहुककी पूर्व दिशामें इक्कीस हजार हाथी चलते थे, जिनपर सोने-चाँदीके हौदे कसे होते थे। उत्तर दिशामें भी उनकी उतनी ही संख्या होती थी। भोजवंशी प्रत्येक भूपालकी भुजामें धनुषकी प्रत्यञ्चाके चिह्न होते थे।

२७- मणिके तेजसे प्रकाशित सत्राजित्‌को देखकर द्वारकावासियोंका आश्चर्य

४४ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

अन्धकवंशियोंने अपनी बहिन आहुकीका विवाह अवन्तीनरेशसे किया था।' आहुकके काश्याके गर्भसे देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्र हुए। देवकके चार पुत्र थे—देववान्, उपदेव, संदेव तथा देवरक्षक। इनके सिवा सात कन्याएँ भी थीं, जिनका विवाह वसुदेवजीके साथ हुआ। इनके नाम इस प्रकार हैं—देवकी, शान्तिदेवा, सुदेवा, देवरक्षिता, वृकदेवी, उपदेवी और सुनाम्नी। उग्रसेनके नौ पुत्र थे, जिनमें कंस बड़ा था। उससे छोटे न्यग्रोध, सुनामा, कङ्क, सुभूषण, राष्ट्रपाल, सुतनु, अनावृष्टि तथा पुष्टिमान् थे। इनकी पाँच बहिनें थीं—कंसा, कंसवती, सुतनु, राष्ट्रपाली तथा कङ्का। यहाँतक कुकुरवंशी उग्रसेन और उनकी संतानोंका वर्णन हुआ।

भजमानके पुत्र विदूरथ हुए, जो रथियोंमें प्रधान थे। विदूरथके शूरवीर राजाधिदेव हुए। राजाधिदेवके पुत्र बड़े पराक्रमी थे। उनके नाम इस प्रकार हैं—दत्त, अतिदत्त, शोणाश्व, श्वेतवाहन, शमी, दण्डशर्मा, दन्तशत्रु तथा शत्रुजित्। इन सबकी दो बहिनें थीं, जो श्रवणा और श्रविष्ठाके नामसे विख्यात हुईं। शमीके पुत्र प्रतिक्षत्र थे, प्रतिक्षत्रके पुत्र स्वयम्भोज, स्वयम्भोजसे हृदीक हुए। हृदीकके बहुत-से पुत्र हुए, जो भयानक पराक्रम करनेवाले थे। उनमें कृतवर्मा सबसे ज्येष्ठ और शतधन्वा मध्यम था। शेष भाइयोंके नाम इस प्रकार हैं—देवान्त, नरान्त, भिषग्, वैतरण, सुदान्त, अतिदान्त, निकाश्य और कामदम्भक। देवान्तके पुत्र विद्वान् कम्बलबर्हिष् हुए। उनके दो पुत्र थे— असमौजा तथा तामसौजा। असमौजाके कोई पुत्र नहीं हुआ; अतः उन्हें सुदंष्ट्र, सुचारु और कृष्ण—ये पुत्र गोदमें प्राप्त हुए। इस प्रकार अन्धकवंशी क्षत्रियोंका वर्णन किया गया।

ऊपर कह आये हैं कि क्रोष्टुके दो पत्नियाँ थीं—गान्धारी और माद्री। गान्धारीने महाबली अनमित्रको जन्म दिया और माद्रीने युधाजित्‌को। अनमित्रके निघ्न हुए। निघ्नके दो पुत्र थे—प्रसेन और सत्राजित्। ये दोनों ही शत्रुसेनाको परास्त करनेवाले थे। भगवान् सूर्य सत्राजित्‌के प्राणोपम सखा थे। एक दिन रात्रि बीतनेपर रथियोंमें श्रेष्ठ सत्राजित् रथपर आरूढ़ हो स्नान एवं सूर्योपस्थान करनेके लिये जलके किनारे गये। वहाँ पहुँचकर जब वे सूर्योपस्थान करने लगे, उस समय भगवान् सूर्य तेजोमण्डलसे युक्त स्पष्ट दिखायी देनेवाला रूप धारण करके उनके आगे प्रकट हो गये। तब राजा सत्राजित्‌ने सामने खड़े हुए सूर्यदेवसे कहा—'प्रभो! आप जिसके द्वारा सदा सम्पूर्ण लोकोंको प्रकाशित करते हैं, वह मणिरत्न मुझे देनेकी कृपा करें।' उनके यों कहनेपर भगवान् भास्करने उन्हें दिव्य स्यमन्तकमणि प्रदान की। सत्राजित्‌ने उसे गलेमें पहनकर अपने नगरमें प्रवेश किया। उन्हें देखकर सब लोग यों कहते हुए दौड़ने लगे—'यह देखो, सूर्य जा रहे हैं।' इस प्रकार नगरके

२८- भगवान् श्रीकृष्णका जाम्बवान्की गुफामें प्रवेश

* क्रोष्टु आदिके वंशका वर्णन तथा स्यमन्तकमणिकी कथा * ४५

लोगोंको आश्चर्यमें डालकर वे अन्तःपुरमें पहुँचे। सत्राजित्ने वह उत्तम मणि अपने छोटे भाई प्रसेनजित्को दे दी, क्योंकि उसको वे बहुत प्यार करते थे। वह मणि अन्धकवंशी यादवोंके घरमें सुवर्ण उत्पन्न करती थी। वह जहाँ रहती, उसके निकटवर्ती जनपदोंमें मेघ समयपर वर्षा करता तथा किसीको रोगका भय नहीं रहता था। एक बार भगवान् श्रीकृष्णने प्रसेनके सम्मुख वह स्यमन्तक नामक मणिरत्न लेनेकी इच्छा प्रकट की; किन्तु उसे वे नहीं पा सके। समर्थ होनेपर भी भगवान्ने उसका बलपूर्वक अपहरण नहीं किया।

एक दिन प्रसेन उस मणिरत्नसे विभूषित हो वनमें शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ स्यमन्तकके लिये ही एक सिंहके हाथसे मारे गये। सिंह उस मणिको मुखमें दबाये भागा जा रहा था। इतनेमें ही महाबली ऋक्षराज जाम्बवान् उधर आ निकले। वे सिंहको मारकर मणिरत्न ले अपनी गुफामें चले गये। इधर वृष्णि और अन्धक-वंशके लोग यह संदेह करने लगे कि हो-न-हो श्रीकृष्णने ही मणिके लिये प्रसेनका वध किया है; क्योंकि उन्होंने एक बार वह मणि प्रसेनसे माँगी थी। भगवान् श्रीकृष्णने यह कार्य नहीं किया था तो भी उनपर संदेह किया गया; अतः अपने कलंकका मार्जन करनेके लिये वे मणिको ढूँढ़ लानेकी प्रतिज्ञा करके वनमें गये। कुछ विश्वसनीय पुरुषोंके साथ प्रसेनके चरण-चिह्नोंका पता लगाते हुए वे उस स्थानपर गये, जहाँ प्रसेन शिकार खेल रहे थे। गिरिवर ऋक्षवान् तथा उत्तम पर्वत विन्ध्यपर उनका अन्वेषण करते हुए वे लोग थक गये। अन्तमें श्रीकृष्णने एक स्थानपर घोड़ेसहित मरे हुए प्रसेनकी लाश देखी, किन्तु वहाँ मणि नहीं मिली। तदनन्तर थोड़ी ही दूरपर ऋक्षके द्वारा मारे गये सिंहका शरीर दिखायी पड़ा। ऋक्ष अपने चरण-चिह्नोंसे पहचाना गया। उन्हीं चिह्नोंके द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण जाम्बवान्की गुफाके द्वारपर पहुँचे। वहाँ उन्हें बिलके भीतरसे किसी धायकी कही हुई यह वाणी सुनायी दी—'मेरे सुकुमार बच्चे! तू मत रो। सिंहने प्रसेनको मारा और सिंह जाम्बवान्के हाथसे मारा गया। अब यह स्यमन्तकमणि तेरी ही है।'

यह आवाज सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उस गुफाके द्वारपर बलरामजीके साथ अन्य यादवोंको बिठा दिया और स्वयं उन्होंने गुफाके भीतर प्रवेश किया। बिलके भीतर जाम्बवान् दिखायी दिये। भगवान् वासुदेवने लगातार इक्कीस दिनोंतक उनके साथ बाहुयुद्ध किया। इसी बीचमें बलदेव आदि यादव द्वारका लौट गये और सबको श्रीकृष्णके मारे जानेकी सूचना दे दी। इधर भगवान् वासुदेवने महाबली जाम्बवान्को परास्त करके उनकी कन्या जाम्बवतीको उन्हींके अनुरोधसे ग्रहण किया। साथ ही अपनी सफाई देनेके लिये वह स्यमन्तकमणि भी ले ली। तत्पश्चात् ऋक्षराजकी अभ्यर्थना करके

२९- श्रीकृष्णका सत्राजित्को मणि समर्पित करना

४६ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

वे बिलसे निकले और विनीत सेवकोंके साथ द्वारकामें गये। वहाँ सब यादवोंसे भरी हुई सभामें श्रीकृष्णने वह मणि सत्राजित्‌को दे दी। इस प्रकार

मिथ्या कलङ्क लगनेपर भगवान् श्रीकृष्णने स्यमन्तकमणिको ढूँढ़ निकाला और उसे देकर अपने ऊपर आये हुए कलङ्कका मार्जन किया। सत्राजित्‌के दस पत्नियाँ थीं। उनके गर्भसे उन्हें सौ पुत्र प्राप्त हुए, जिनमें तीन अधिक प्रसिद्ध थे—भंगकार, वातपति और वसुमेध। सत्राजित्‌के तीन कन्याएँ भी थीं, जो सब दिशाओंमें विख्यात थीं—सत्यभामा, व्रतिनी तथा प्रस्वापिनी। इनमें सत्यभामा सबसे उत्तम थीं। उसका विवाह पिताने श्रीकृष्णके साथ कर दिया। जो भगवान् श्रीकृष्णके इस मिथ्या कलङ्कका श्रवण करता है, उसे मिथ्या कलङ्क कभी स्पर्श नहीं करते।

श्रीकृष्णने सत्राजित्‌को जो स्यमन्तकमणि दी थी, उसका अक्रूरने भोजवंशी शतधन्वाके द्वारा अपहरण करा दिया। महाबली शतधन्वा सत्राजित्‌को मारकर वह मणि ले आया तथा अक्रूरको दे दी।

अक्रूरने उस उत्तम रत्नको लेते हुए शतधन्वासे प्रतिज्ञा करा ली कि 'मेरा नाम न बताना।'

पिताके मारे जानेपर मनस्विनी सत्यभामा दुःखसे आतुर हो उठी और रथपर आरूढ़ हो वारणावत नगरमें गयी। वहाँ अपने स्वामी श्रीकृष्णको शतधन्वाकी सारी करतूतें बतलाकर उनके पास खड़ी हो आँसू बहाने लगी। तब भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही द्वारका आ पहुँचे और अपने बड़े भाई बलरामजीसे बोले—'प्रभो! प्रसेनको तो सिंहने मार डाला और सत्राजित्‌को शतधन्वाने। अब स्यमन्तकमणि मेरे अधिकारमें आनेवाली है। अब मैं ही उसका उत्तराधिकारी हूँ; इसलिये शीघ्र ही रथपर बैठिये और महारथी शतधन्वाको मारकर मणि छीन लीजिये। महाबाहो! अब स्यमन्तक हमलोगोंका ही होगा।' तदनन्तर शतधन्वा और श्रीकृष्णमें घोर युद्ध हुआ। शतधन्वा सब ओर अक्रूरके आनेकी बाट देखने लगा। वह और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों ही एक-दूसरेपर कुपित हो रहे थे। जब अक्रूरने साथ नहीं दिया, तब शतधन्वाने भयभीत हो भाग जानेका विचार किया। उसके पास हृदया नामकी एक घोड़ी थी, जो सौ योजन चलती थी। वह उसीपर आरूढ़ हो श्रीकृष्णसे युद्ध कर रहा था। सौ योजनका मार्ग वेगसे तै करनेके कारण वह घोड़ी थककर शिथिल हो गयी। यह देख भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीसे कहा—'महाबाहो! आप यहीं खड़े रहें। मैंने उस घोड़ीकी कमजोरी देख ली है। अब तो मैं पैदल ही जाकर मणिरत्न स्यमन्तकको छीन लाऊँगा' यह कहकर भगवान् पैदल ही शतधन्वाके पास गये और मिथिलाके समीप उन्होंने उसका वध कर डाला, परंतु उसके पास स्यमन्तक नहीं दिखायी दिया। महाबली शतधन्वाको मारकर जब श्रीकृष्ण लौटे, तब बलरामजीने कहा—'मणि

१०- जम्बूद्वीप तथा उसके विभिन्न वर्षोंसहित भारत-वर्षका वर्णन

* जम्बूद्वीप तथा उसके विभिन्न वर्षोंसहित भारतवर्षका वर्णन * ४७

मुझको दे दो।' भगवान् श्रीकृष्णने उत्तर दिया—'मणि नहीं मिली।' कुछ दिनके बाद नरश्रेष्ठ अक्रूर अन्धकवंशी वीरोंके साथ द्वारकामें लौट आये। भगवान् श्रीकृष्णने योगके द्वारा यह जान लिया कि मणि वास्तवमें अक्रूरके ही पास है। तब उन्होंने सभामें बैठकर अक्रूरसे कहा—'आर्य! मणिश्रेष्ठ स्यमन्तक आपके हाथ लग गया है। उसे मुझे दे दीजिये। उसकी प्रतीक्षामें बहुत समय व्यतीत हो चुका है।'

सम्पूर्ण यादवोंकी सभामें श्रीकृष्णके यों कहनेपर महामति अक्रूरजीने बिना किसी कष्टके वह मणि दे दी। सरलतासे उसकी प्राप्ति हो जानेपर भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने वह मणि फिर अक्रूरको ही लौटा दी। भगवान् श्रीकृष्णके हाथसे प्राप्त हुए मणिरत्न स्यमन्तकको गलेमें पहनकर अक्रूर सूर्यकी भाँति प्रकाशित होने लगे।


जम्बूद्वीप तथा उसके विभिन्न वर्षोंसहित भारतवर्षका वर्णन

**मुनियोंने कहा—**अहो! आपने समस्त भरतवंशी राजाओंका यह बहुत बड़ा इतिहास कह सुनाया। अब हम समस्त भूमण्डलका वर्णन सुनना चाहते हैं। जितने समुद्र, द्वीप, वर्ष, पर्वत, वन, नदियाँ तथा पवित्र देवताओंके स्थान हैं, समस्त भूतलका मान जितना बड़ा है, जिसके आधारपर यह टिका हुआ है तथा जो इसका उपादान कारण है, वह सब यथार्थरूपसे बतलािये।

**लोमहर्षणजी बोले—**मुनिवरो! सुनो, मैं इस भूमण्डलका वृत्तान्त संक्षेपमें सुनाता हूँ। जम्बू, प्लक्ष, शाल्मल, कुश, क्रौञ्च, शाक तथा पुष्कर—ये सात द्वीप हैं, जो क्रमशः—लवण, इक्षुरस, सुरा, घृत, दधि, दुग्ध तथा जलरूप सात समुद्रोंसे घिरे हुए हैं। इन सबके बीचमें जम्बूद्वीपकी स्थिति है। उसके मध्यभागमें सुवर्णमय मेरुपर्वत है, जिसकी ऊँचाई चौरासी हजार योजन है। वह पृथ्वीके भीतर सोलह हजार योजनतक चला गया है तथा उसके शिखरकी चौड़ाई बतीस हजार योजन है। उसके मूलका विस्तार सोलह हजार योजन है। वह पर्वत पृथ्वीरूपी कमलकी कर्णिकाके रूपमें स्थित है। उसके दक्षिणमें हिमवान्, हेमकूट और निषध पर्वत हैं तथा उत्तरमें नील, श्वेत और शृङ्गवान् गिरि हैं। मध्यके दो पर्वत (निषध और नील) एक-एक लाख योजन लंबे हैं। शेष पर्वत क्रमशः दस-दस हजार योजन छोटे होते गये हैं। उन सबकी ऊँचाई और चौड़ाई दो-दो हजार योजन है। मेरुके दक्षिणमें भारतवर्ष है। उससे उत्तर किम्पुरुषवर्ष तथा उससे भी उत्तर हरिवर्ष है। इसी प्रकार मेरुके उत्तर भागमें सबके अन्तमें रम्यकवर्ष, उससे दक्षिण हिरण्मयवर्ष तथा उससे

४८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


भी दक्षिण उत्तरकुरु है। इन छहों वर्षोंके बीचमें इलावृतवर्ष है, जिसके मध्यभागमें सुवर्णमय ऊँचा मेरुपर्वत खड़ा है। यह वर्ष मेरुके चारों ओर नौ हजार योजनतक फैला हुआ है। उसमें मेरुसे पूर्व मन्दराचल, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें विपुल तथा उत्तरमें सुपार्श्वपर्वतकी स्थिति है। इन चारों पर्वतोंपर क्रमशः—कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट—ये चार वृक्ष हैं, जो ग्यारह-ग्यारह सौ योजन विस्तारके हैं। वे वृक्ष उन पर्वतोंकी ध्वजाके रूपमें सुशोभित हैं। वह जम्बू-वृक्ष ही इस द्वीपके जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण है। उसके फल विशाल गजराजके बराबर होते हैं। वे गन्धमादनपर्वतपर सब ओर गिरकर फूट जाते हैं। उनके रससे वहाँ जम्बू नामकी नदी बहती है। वहाँके निवासी उसी नदीका जल पीते हैं। उसके पीनेसे लोगोंके शरीर और मन स्वस्थ रहते हैं। उन्हें खेद नहीं होता। उनके शरीरमें दुर्गन्ध नहीं होती तथा उनकी इन्द्रियाँ कभी क्षीण नहीं होती। जम्बूके रसको पाकर उस नदीके तटकी मिट्टी जाम्बूनद नामक सुवर्णके रूपमें परिणत हो जाती है, जो सिद्धोंके आभूषणके काम आती है। मेरुसे पूर्व भद्राश्व और पश्चिममें केतुमालवर्ष हैं। इन दोनोंके बीचमें इलावृतवर्ष है। मेरुके पूर्व चैत्ररथ, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें वैभ्राज तथा उत्तरमें नन्दनवन है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न दिशाओंमें अरुणोद, महाभद्र, असितोद तथा मानस—ये चार सरोवर हैं, जो सदा देवताओंके उपभोगमें आते हैं। शान्तवान्, चक्रकुञ्ज, कुररी, माल्यवान् तथा वैकङ्क आदि पर्वत मेरुके पूर्वभागमें केसराचलके रूपमें स्थित हैं। त्रिकूट, शिशिर, पतङ्ग, रुचक तथा निषध आदि दक्षिणभागके केसर-पर्वत हैं। शिखिवास, वैदूर्य, कपिल, गन्धमादन और जारुधि आदि पश्चिमभागके केसराचल हैं। शङ्खकूट, ऋषभ, हंस, नाग तथा कालञ्जर आदि अन्य पर्वत उत्तरभागके केसराचल हैं। मेरुगिरिके ऊपर चौदह हजार योजनके विस्तारवाली एक विशाल पुरी है, जो ब्रह्माजीकी सभा कहलाती है। उसमें सब ओर आठों दिशाओं और विदिशाओंमें इन्द्र आदि लोकपालोंके विख्यात नगर हैं।

भगवान् विष्णुके चरणोंसे निकलकर चन्द्रमण्डलको आप्लावित करनेवाली गङ्गा ब्रह्मपुरीके चारों ओर गिरती हैं। वहाँ गिरकर वे चार भागोंमें बँट जाती हैं। उस समय उनके क्रमशः—सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नाम होते हैं। पूर्व ओर सीता एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर होती हुई पूर्ववर्ती भद्राश्ववर्षके मार्गसे समुद्रमें जा मिलती है। इसी प्रकार अलकनन्दा दक्षिण-पथसे भारतवर्षमें आती और वहाँ सात भेदोंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिल जाती है। चक्षुकी धारा पश्चिमके सम्पूर्ण पर्वतोंको लाँघकर केतुमालवर्षमें आती और समुद्रमें मिल जाती है। इसी प्रकार भद्रा उत्तरगिरि तथा उत्तरकुरुको लाँघकर उत्तरसमुद्रमें मिलती है। माल्यवान् और गन्धमादनपर्वत नीलगिरिसे लेकर निषधपर्वततक फैले हुए हैं। उन दोनोंके मध्यभागमें मेरु कर्णिकाके आकारमें स्थित है। भारत, केतुमाल, भद्राश्व तथा कुरु—ये द्वीप लोकरूपी कमलके पत्र हैं। जठर और देवकूट—ये दो मर्यादा-पर्वत हैं। ये नीलसे निषध पर्वततक उत्तर-दक्षिण फैले हुए हैं। ये दोनों मेरुके पश्चिमभागमें पूर्ववत् स्थित हैं। त्रिशृङ्ग और जारुधि—ये उत्तर-दिशाके वर्षपर्वत हैं, जो पूर्वसे पश्चिम ओर समुद्रके भीतरतक चले गये हैं। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने मर्यादापर्वतोंका वर्णन किया, जो मेरुके चारों ओर दो-दो करके स्थित हैं। मेरुपर्वतके सब ओर जो केसरपर्वत बतलाये गये हैं, उनकी गुफाएँ बड़ी मनोहर हैं, जिनमें सिद्ध और चारण निवास करते हैं। वहाँ सुरम्य

* जम्बूद्वीप तथा उसके विभिन्न वर्षोंसहित भारतवर्षका वर्णन * ४९

वन और नगर हैं। लक्ष्मी, विष्णु, अग्नि, सूर्य तथा इन्द्र आदि देवताओंके बड़े-बड़े मन्दिर हैं, जो किन्नरोंसे सेवित हैं। उन पर्वतोंकी रमणीय गुफाओंमें गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य और दानव दिन-रात विहार किया करते हैं। वे पर्वत इस पृथ्वीके स्वर्ग माने गये हैं। वहाँ धर्मात्माओंका निवास है, पापी मनुष्य सैकड़ों जन्म धारण करनेपर भी वहाँ नहीं जा सकते। भद्राश्ववर्षमें भगवान् विष्णु हयग्रीवरूपसे विराजमान हैं। केतुमालमें वाराह, भारतवर्षमें कच्छप तथा उत्तरकुरुमें मत्स्यरूप धारण करके रहते हैं। सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि सर्वस्वरूप हैं तथा विश्वरूपमें वे सर्वत्र सुशोभित होते हैं। अखिल जगत्स्वरूप भगवान् विष्णु सबके आधारभूत हैं। किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें शोक, आयास, उद्वेग तथा क्षुधाका भय आदि दोष नहीं हैं। वहाँकी प्रजा सब प्रकारसे स्वस्थ निर्भय तथा सब प्रकारके दुःखोंसे रहित हैं। उन सबकी स्थिर आयु दस-बारह हजार वर्षोंतककी होती है। इन स्थानोंमें पृथ्वीके क्षुधा, पिपासा आदि अन्य दोष भी नहीं प्रकट होते। इन सभी वर्षोंमें सात-सात कुल-पर्वत हैं, जिनसे सैकड़ों नदियाँ प्रकट हुई हैं।

समुद्रके उत्तर और हिमालयके दक्षिणका जो देश है, उसका नाम भारतवर्ष है। उसीमें राजा भरतकी संतान तथा प्रजा रहती है। उसका विस्तार नौ हजार योजन है। भारतवर्ष कर्मभूमि है। वहाँ इच्छानुसार साधन करनेवालोंको स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त होते हैं। भारतमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात कुलपर्वत हैं। यहाँ सकाम साधनसे स्वर्ग प्राप्त होता है, निष्काम साधनसे मोक्ष मिलता है तथा यहाँके लोग पाप करनेपर तिर्यग्योनि और नरकोंमें भी पड़ते हैं। भारतके सिवा अन्यत्र मनुष्योंके लिये कर्मभूमि नहीं है। इस भारतवर्षके नौ भेद हैं—इन्द्रद्वीप, कसेतुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्यद्वीप, गन्धर्वद्वीप, वारुणद्वीप तथा समुद्रसे घिरा हुआ यह नवाँ द्वीप भारत। यह नवम द्वीप दक्षिणसे उत्तरतक एक हजार योजन लंबा है। इसके अंदर पूर्व-दिशामें किरात तथा पश्चिम-दिशामें यवन रहते हैं; मध्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जातिके लोग रहते हैं, जिनकी क्रमशः—यज्ञ, युद्ध, वाणिज्य तथा सेवा—ये चार वृत्तियाँ हैं। शतद्रू (सतलज) और चन्द्रभागा (चनाब) आदि नदियाँ हिमालयकी शाखाओंसे निकली हैं। वेदस्मृति आदि सरिताओंका उद्गम पारियात्र-पर्वत है। नर्मदा और सुरमा आदि नदियाँ विन्ध्यपर्वतसे प्रकट हुई हैं। तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या तथा कावेरी आदि सरिताएँ ऋक्षकी शाखासे निकली हैं। इनका नाम श्रवण करनेमात्रसे ये सब पापोंको हर लेती हैं। गोदावरी, भीमरथी तथा कृष्णवेणी आदि पापनाशिनी नदियाँ सह्यपर्वतकी संतानें हैं। कृतमाला, ताम्रपर्णी आदिका उद्गमस्थान मलयपर्वत है। त्रिसंध्य, ऋषिकुल्या आदि नदियाँ महेन्द्रपर्वतसे प्रकट हुई हैं। ऋषिकुल्या और कुमारा आदि नदियाँ शुक्तिमान्‌के शाखापर्वतोंसे निकली हैं। इन नदियोंकी शाखाभूत सहस्रों उपनदियाँ भी हैं। इनके मध्यमें कुरु, पाञ्चाल, मध्यप्रदेश, पूर्वदेश, कामरूप (आसाम), पौण्ड्र, कलिङ्ग (उड़ीसा), मगध, दक्षिणके प्रदेश, अपरान्त, सौराष्ट्र (काठियावाड़), शूद्र, आभीर, अर्बुद (आबू), मरु (मारवाड़), मालवा, पारियात्र, सौवीर, सिंधु, शाल्व, शाकल्य, मद्र, अम्बष्ठ तथा पारसीक आदि प्रदेश और वहाँके निवासी रहते हैं। वे उपर्युक्त नदियोंके जल पीते तथा समभावसे रहते हैं। उक्त

११- प्लक्ष आदि छः द्वीपोंका वर्णन और भूमिकामान

५० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

प्रदेशोंके लोग बड़े भाग्यशाली एवं हृष्ट-पुष्ट हैं। उन सबका निवास भारतवर्षमें ही है। महामुने! सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये चार युग इस भारतवर्षमें ही होते हैं, अन्यत्र कहीं नहीं होते। यहीं पारलौकिक लाभके लिये यति तपस्या करते, यज्ञकर्ता अग्निमें आहुति डालते तथा दाता आदरपूर्वक दान देते हैं। जम्बूद्वीपमें मनुष्य सदा अनेक यज्ञोंद्वारा यज्ञमय यज्ञपुरुष भगवान् विष्णुका यजन करते हैं। अन्य द्वीपोंमें दूसरे प्रकारकी उपासनाएँ हैं। महामुने! जम्बूद्वीपमें भी भारतवर्ष सबसे श्रेष्ठ है; क्योंकि यह कर्मभूमि है और अन्य देश भोगभूमि हैं। यहाँ लाखों जन्म धारण करनेके बाद बहुत बड़े पुण्यके संचयसे जीव कभी मनुष्य-जन्म पाता है। देवता यह गीत गाते हैं कि 'जो जीव स्वर्ग और मोक्षके हेतुभूत भारतवर्षके भूभागमें बारंबार मनुष्यरूपमें उत्पन्न होते हैं और फलेच्छासे रहित कर्मका अनुष्ठान करके उन्हें परमात्मस्वरूप श्रीविष्णुको अर्पण कर देते हैं, वे धन्य हैं।* जो इस कर्मभूमिमें उत्पन्न हो सत्कर्मोंद्वारा अपने अन्तःकरणको शुद्ध करके भगवान् अनन्तमें लीन होते हैं, उनका जीवन धन्य है। हमें पता नहीं, इस स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाले पुण्यलोकके क्षीण होनेपर हम फिर कहाँ देह धारण करेंगे। वे मनुष्य, जो भारतवर्षमें जन्म लेकर सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे सम्पन्न हैं, धन्य हैं।' विप्रवरो! यह नौ वर्षोंसे युक्त जम्बूद्वीपका वर्णन किया गया। उसका विस्तार एक लाख योजन है तथापि यहाँ संक्षेपसे ही बताया गया है। जम्बूद्वीपको गोलाकारमें चारों ओरसे घेरकर खारे पानीका समुद्र स्थित है। उसका विस्तार भी एक लाख योजन है।


प्लक्ष आदि छः द्वीपोंका वर्णन और भूमिका मान

लोमहर्षणजी कहते हैं—जिस प्रकार जम्बूद्वीप खारे पानीके समुद्रसे घिरा हुआ है, उसी प्रकार उस समुद्रको भी घेरकर प्लक्षद्वीप स्थित है। जम्बूद्वीपका विस्तार एक लाख योजन बताया गया है। प्लक्षद्वीपका विस्तार उससे दुगुना है। प्लक्षद्वीपके स्वामी राजा मेधातिथिके सात पुत्र हुए। उनमें ज्येष्ठ पुत्रका नाम शान्तमय है। उससे छोटे क्रमशः शिशिर, सुखोदय, आनन्द, शिव, क्षेमक तथा ध्रुव हैं। ये सभी प्लक्षद्वीपके राजा हुए। इन्हींके नामपर उस द्वीपके सात वर्ष हैं। उनकी सीमा बनानेवाले सात ही वर्षपर्वत हैं। उनके नाम बतलाता हूँ, सुनो। गोमेद, चन्द्र, नारद, दुन्दुभि, सोमक, सुमना तथा वैभ्राज—ये सात वर्षपर्वत हैं। इन रमणीय पर्वतोंपर देवताओं और गन्धर्वोंसहित वहाँकी प्रजा निवास करती है। उन सबमें पवित्र जनपद हैं, वीर पुरुष हैं। वहाँ किसीकी मृत्यु नहीं होती। मानसिक चिन्ताएँ तथा व्याधियाँ भी नहीं सतातीं। वहाँ हर समय सुख मिलता है। प्लक्षद्वीपके वर्षोंमें सात ही ऐसी नदियाँ हैं, जो समुद्रमें जा मिलती हैं। अनुतप्ता,


* अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महामुने। यतो हि कर्मभूरेषा यतोऽन्या भोगभूमयः।
अत्र जन्मसहस्राणां सहस्रैरपि सत्तम्। कदाचिल्लभते जन्तुर्मानुष्यं पुण्यसञ्चयात्॥
गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ये भारतभूमिभागे। स्वर्गापवर्गास्पदेहेतुभूते भवन्ति भूयः पुरुषा मनुष्याः॥
कर्माण्यसंकल्पिततत्फलानि संन्यस्य विष्णौ परमात्मरूपे।
(१९। २३—२६)

* प्लक्ष आदि छः द्वीपोंका वर्णन और भूमिका मान *

५१

शिखा, विप्राशा, त्रिदिवा, क्रमु, अमृता तथा सुकृता—ये सात वहाँकी नदियाँ हैं। इस प्रकार प्लक्षद्वीपके प्रधान-प्रधान पर्वतों और नदियोंका वर्णन किया गया। छोटी-छोटी नदियाँ और छोटे-छोटे पहाड़ तो वहाँ हजारों हैं। उन वर्षोंमें युगोंकी व्यवस्था नहीं है। वहाँ सदा ही त्रेतायुगके समान समय रहता है। प्लक्षद्वीपसे लेकर शाकद्वीपतकके लोग पाँच हजार वर्षोंतक नीरोग जीवन व्यतीत करते हैं। उन द्वीपोंमें वर्णाश्रम-विभागपूर्वक चार प्रकारका धर्म है तथा वहाँ चार ही वर्ण हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—आर्यक, कुरु, विविवश तथा भावी। ये क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रकी कोटिके हैं। उस द्वीपके मध्यभागमें प्लक्ष (पाकड़) नामका बहुत विशाल वृक्ष है, जो जम्बूद्वीपमें स्थित जम्बू (जामुन) वृक्षके ही बराबर है। उसीके नामपर उस द्वीपका प्लक्षद्वीप नाम रखा गया है। प्लक्षद्वीपमें आर्यक आदि वर्णोंके लोग जगत्स्रष्टा सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरिका चन्द्रमाके रूपमें यजन करते हैं। प्लक्षद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले मण्डलाकार इक्षुरसके समुद्रसे घिरा हुआ है। अब शाल्मलद्वीपका वर्णन सुनो।

शाल्मलद्वीपके स्वामी वीर वपुष्मान् हैं। उनके सात पुत्र हैं और उन्हींके नामपर वहाँ सात वर्ष स्थित हैं। जिनके नाम इस प्रकार हैं—श्वेत, हरित, जीमूत, रोहित, वैद्युत, मानस तथा सुप्रभ। इक्षुरसका जो समुद्र बताया गया है, वह अपने दुगुने विस्तारवाले शाल्मलद्वीपके द्वारा सब ओरसे घिरा हुआ है। वहाँ भी सात ही वर्षपर्वत हैं, जहाँ रत्नोंकी खानें हैं। नदियाँ भी सात ही हैं। पहले पर्वतोंके नाम सुनो—कुमुद, उन्नत, वलाहक, द्रोण, कङ्क, महिष तथा पर्वतश्रेष्ठ ककुद्मान्—ये सात पर्वत हैं। इनमें द्रोणपर्वतपर कितनी ही महौषधियाँ हैं। नदियोंके नाम इस प्रकार हैं—श्रोणी, तोया, वितृष्णा, चन्द्रा, शुक्ला, विमोचनी तथा निवृत्ति। वहाँ श्वेत आदि सात वर्ष हैं, जिनमें चारों वर्णोंके लोग निवास करते हैं। शाल्मलद्वीपमें कपिल, अरुण, पीत तथा कृष्ण वर्णके लोग होते हैं, जो क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र माने जाते हैं। वे सब लोग यज्ञपरायण हो सबके आत्मा, अविनाशी एवं यज्ञमें स्थित भगवान् विष्णुकी वायुरूपमें आराधना करते हैं। इस अत्यन्त मनोहर द्वीपमें देवताओंका सांनिध्य बना रहता है। वहाँ शाल्मलि नामका महान् वृक्ष है, जो उस द्वीपके नामकरणका कारण बना है। यह द्वीप अपने समान विस्तारवाले सुराके समुद्रसे घिरा हुआ है और वह सुराका समुद्र शाल्मलद्वीपसे दुगुने विस्तारवाले कुशद्वीपद्वारा सब ओरसे आवृत्त है। कुशद्वीपमें ज्योतिष्मान् राजा हैं; अब उनके पुत्रोंके नाम बतलाये जाते हैं, सुनो—उद्भिद्, वेणुमान्, सुरथ, रन्थन, धृति, प्रभाकर और कपिल। इन्हींके नामोंपर वहाँके सात वर्ष प्रसिद्ध हैं। वहाँ मनुष्योंके साथ-साथ दैत्य, दानव, देवता, गन्धर्व, यक्ष और किंनर आदि भी निवास करते हैं। वहाँके मनुष्योंमें भी चार ही वर्ण हैं, जो अपने-अपने कर्तव्यके पालनमें तत्पर रहते हैं। उन वर्णोंके नाम इस प्रकार हैं—दमी, शुष्मी, स्नेह तथा मन्देह। ये क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रकी श्रेणीमें बताये गये हैं। वे शास्त्रोक्त कर्मोंका ठीक-ठीक पालन करते और अपने अधिकारके आरम्भक कर्मोंका क्षय होनेके लिये कुशद्वीपमें ब्रह्मारूपी भगवान् जनार्दनका यजन करते हैं। विद्रुम, हेमशैल, द्युतिमान्, पुष्टिमान्, कुशेशय, हरि और मन्दराचल—ये सात उस द्वीपके वर्षपर्वत हैं। नदियाँ भी सात ही हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—धूतपापा, शिवा, पवित्रा, सम्मति, विद्युत्,

५२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *


अम्भस् तथा मही। ये सब पापोंका अपहरण करनेवाली नदियाँ हैं। इनके अतिरिक्त भी वहाँ बहुत-सी छोटी-छोटी नदियाँ और पर्वत हैं। कुशद्वीपमें कुशोंका बहुत बड़ा वन है, अतः उसीके नामपर उस द्वीपकी प्रसिद्धि हुई है। वह द्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले घीके समुद्रसे घिरा हुआ है।

मुनिवरो! उपर्युक्त घीका समुद्र क्रौञ्चद्वीपसे घिरा हुआ है। उसका विस्तार कुशद्वीपसे दुगुना है। क्रौञ्चद्वीपके राजा द्युतिमान् हैं। महात्मा द्युतिमान्‌के सात पुत्र हैं। महामना द्युतिमान्‌ने अपने पुत्रोंके ही नामसे क्रौञ्चद्वीपके सात विभाग किये, जिनके नाम ये हैं—कुशग, मन्दग, उष्ण, पीवर, अन्धकारक, मुनि और दुन्दुभि। क्रौञ्चद्वीपमें भी बड़े ही मनोरम सात वर्षपर्वत हैं, जिनपर देवता और गन्धर्व निवास करते हैं। उनके नाम ये हैं—क्रौञ्च, वामन, अन्धकारक, देवव्रत, धर्म, पुण्डरीकवान् तथा दुन्दुभि। ये एक-दूसरेसे दुगुने बड़े हैं। जितने द्वीप हैं, द्वीपोंमें जितने पर्वत हैं तथा पर्वतोंद्वारा सीमित जितने वर्ष हैं, उन सभी रमणीय प्रदेशोंमें देवताओंसहित समस्त प्रजा बेखटके निवास करती है। क्रौञ्चद्वीपमें पुष्कल, पुष्कर, धन्य तथा ख्यात—ये चार वर्ण हैं, जो क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्रकी कोटिके माने गये हैं। वहाँ छोटी-बड़ी सैकड़ों नदियाँ हैं, जिनमें सात प्रधान हैं—गौरी, कुमुद्वती, संध्या, रात्रि, मनोजवा, ख्याति तथा पुण्डरीका। क्रौञ्चद्वीपके निवासी इन्हीं नदियोंका जल पीते हैं। वहाँ पुष्कर आदि वर्णोंके लोग यज्ञके समीप ध्यानयोगके द्वारा रुद्रस्वरूप भगवान् जनार्दनका यजन करते हैं। क्रौञ्चद्वीप अपने समान परिमाणवाले दधिमण्डोद नामक समुद्रसे घिरा हुआ है तथा वह समुद्र भी शाकद्वीपसे आवृत्त है। शाकद्वीपका विस्तार क्रौञ्चद्वीपसे दूना है। उसके स्वामी महात्मा भव्य हैं। उनके सात पुत्र हैं, जिन्हें राजाने उस द्वीपके सात विभाग करके वहाँका राज्य दिया है। राजपुत्रोंके नाम ये हैं—जलद, कुमार, सुकुमार, मनीरुक, कुसुमोद, मोदाकि तथा महाद्रुम। इन्हींके नामोंपर वहाँके सात वर्ष प्रसिद्ध हुए हैं। वहाँ भी सात पर्वत हैं, जो जलद आदि वर्षोंकी सीमा निर्धारित करते हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं—उदयगिरि, जलधार, रैवतक, श्याम, अम्भोगिरि, आस्तिकेय तथा केसरी। वहाँ शाक (सागवान) का बहुत बड़ा वृक्ष है, जहाँ सिद्ध और गन्धर्व निवास करते हैं। उसके पत्तोंको छूकर बहनेवाली वायुका स्पर्श होनेसे बड़ा आनन्द मिलता है। वहाँके पवित्र जनपद चार वर्णोंके लोगोंसे सुशोभित हैं। शाकद्वीपमें महात्मा पुरुष निर्भय एवं नीरोग होकर निवास करते हैं। वहाँकी नदियाँ भी परम पवित्र तथा सब पापोंका नाश करनेवाली हैं। उनके नाम ये हैं—सुकुमारी, कुमारी, नलिनी, रेणुका, इक्षु, धेनुका तथा गभस्ति। इनके अतिरिक्त वहाँ छोटी-छोटी हजारों नदियाँ हैं। पर्वत भी सहस्रोंकी संख्यामें हैं, जलदादि वर्षोंके निवासी बड़ी प्रसन्नताके साथ पूर्वोक्त नदियोंका जल पीते हैं। मग, मागध, मानस तथा मन्दग—ये ही वहाँके चार वर्ण हैं—मग ब्राह्मण, मागध क्षत्रिय, मानस वैश्य तथा मन्दग शूद्र जानने चाहिये। शाकद्वीपमें रहनेवाले लोग अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर शास्त्रोक्त सत्कर्मोंके द्वारा सूर्यरूपधारी भगवान् विष्णुका पूजन करते हैं। शाकद्वीप अपने ही बराबर विस्तारवाले क्षीरसागरद्वारा सब ओरसे घिरा हुआ है।

क्षीरसागरको पुष्करद्वीपने चारों ओरसे घेर रखा है। उसका विस्तार शाकद्वीपसे दुगुना है। पुष्करके महाराज सवनको दो पुत्र हुए—महावीत और धातकि। उन्हीं दोनोंके नामपर उस द्वीपके दो विभाग हुए हैं एकका नाम महावीतवर्ष और

  • प्लक्ष आदि छः द्वीपोंका वर्णन और भूमिका मान * ५३

दूसरेका धातकिवर्ष है। उस द्वीपमें एक ही वर्ष-पर्वत है, जो मानसोत्तरके नामसे विख्यात है। मानसोत्तरपर्वत पुष्करद्वीपके मध्यभागमें वलयाकार स्थित है। उसकी ऊँचाई पचास हजार योजनकी है, चौड़ाई भी उतनी ही है। वह उस द्वीपके चारों ओर मण्डलाकार स्थित है। वह पुष्करद्वीपको बीचसे चीरता हुआ-सा खड़ा है। उसीसे विभक्त होकर उस द्वीपके दो खण्ड हो गये हैं। प्रत्येक खण्ड गोलाकार है और उन दोनों खण्डोंके बीचमें वह महापर्वत स्थित है। वहाँके मनुष्य दस हजार वर्षोंतक जीवित रहते हैं। वे सब लोग रोग-शोकसे वर्जित तथा राग-द्वेषसे शून्य होते हैं। उनमें ऊँच-नीचका कोई भेद नहीं है। वहाँ न कोई वध्य है, न वधिक। वहाँके लोगोंमें ईर्ष्या, असूया, भय, रोष, दोष और लोभ आदि नहीं होते। महावीतवर्ष मानसोत्तरपर्वतके बाहर है और धातकिवर्ष भीतर। उसमें देवता और दैत्य आदि सभी निवास करते हैं। पुष्करद्वीपमें सत्य और असत्य नहीं हैं। उसके दोनों खण्डोंमें न कोई नदी है न दूसरा पर्वत। वहाँके मनुष्य देवताओंके समान रूप और वेषवाले होते हैं। उन दोनों वर्षोंमें वर्ण और आश्रमका आचार नहीं है। वहाँ किसीके धर्मका अपहरण नहीं होता। वेदत्रयी, वार्ता (कृषि-वाणिज्य आदि), दण्डनीति तथा शुश्रूषा आदिका व्यवहार भी नहीं देखा जाता; अतः उक्त दोनों वर्ष भूमण्डलके उत्तम स्वर्ग समझे जाते हैं। वहाँका प्रत्येक समय सबके लिये सुखद होता है। किसीको जरा-अवस्था या रोगका कष्ट नहीं होता। पुष्करद्वीपमें एक बरगदका विशाल वृक्ष है, जो ब्रह्माजीका उत्तम स्थान माना गया है। उसके नीचे देवता और असुरोंसे पूजित भगवान् ब्रह्मा निवास करते हैं। पुष्करद्वीप अपने समान विस्तारवाले मीठे जलके समुद्रसे घिरा है। इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रोंसे आवृत हैं। एक द्वीप और समुद्रका विस्तार समान माना गया है। उसकी अपेक्षा दूसरे समुद्र और द्वीप दुगुने बड़े हैं। सब समुद्रोंमें सदा समान जल रहता है। उसमें कभी न्यूनता या अधिकता नहीं होती। जैसे बटलोईमें रखा हुआ जल आगका संयोग होनेसे उफन उठता है, उसी प्रकार चन्द्रमाकी वृद्धि होनेपर समुद्रके जलमें ज्वार आता है। उसका जल बढ़ता है और फिर घट जाता है; तथापि उसमें न्यूनता या अधिकता नहीं होती। शुक्ल और कृष्णपक्षमें चन्द्रमाके उदय और अस्त होनेपर समुद्रके जलका उत्थान पंद्रह सौ अंगुल ऊँचेतक देखा गया है। उत्थानके बाद जल पुनः उतारमें आ जाता है। पुष्करद्वीपमें सबके लिये भोजन स्वतः उपस्थित हो जाता है। वहाँकी समस्त प्रजा सदा षड्रसयुक्त भोजन करती है। स्वादिष्ट जलवाले समुद्रके दोनों तटोंपर लोकोंकी स्थिति देखी जाती है। उसके आगेकी भूमि सुवर्णमयी है, जिसका विस्तार पुष्करद्वीपसे दुगुना है। वहाँ किसी भी जीव-जन्तुका निवास नहीं है। उसके आगे लोकालोकपर्वत है, जो दस हजार योजनतक फैला हुआ है। उसकी ऊँचाई भी उतने ही योजनोंकी है। लोकालोकपर्वतके बाद अन्धकार है, जो उस पर्वतको सब ओरसे आच्छादित करके स्थित है। अन्धकार भी अण्डकटाहके द्वारा सब ओरसे घिरा है। इस प्रकार अण्डकटाह, द्वीप तथा पर्वतोंसहित इस सम्पूर्ण पृथ्वीका विस्तार पचास करोड़ योजन है। यह भूमि सबका धारण-पोषण करनेवाली है। इसमें सब भूतोंकी अपेक्षा अधिक गुण हैं। यह सम्पूर्ण जगत्की आधारभूता है।

१२- पाताल और नरकोंका वर्णन तथा हरिनाम-कीर्तनकी महिमा

५४

  • संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

पाताल और नरकोंका वर्णन तथा हरिनाम-कीर्तनकी महिमा

लोमहर्षणजी कहते हैं—मुनिवरो ! इस प्रकार यह पृथ्वीका विस्तार बतलाया गया। इसकी ऊँचाई भी सत्तर हजार योजन है। पृथ्वीके भीतर सात तल हैं, जिनमेंसे प्रत्येककी ऊँचाई दस-दस हजार योजनकी है। उन सातों तलोंके नाम ये हैं—अतल, वितल, नितल, सुतल, तलातल, रसातल तथा पाताल। इनकी भूमि क्रमशः काली, सफेद, लाल, पीली, कँकरीली, पथरीली तथा सुवर्णमयी है। सातों ही तल बड़े-बड़े महलोंसे सुशोभित हैं। उनमें दानव और दैत्योंकी सैकड़ों जातियाँ निवास करती हैं। विशालकाय नागोंके कुटुम्ब भी उनके भीतर रहते हैं। एक समय पातालसे लौटे हुए देवर्षि नारदजीने स्वर्गलोककी सभामें कहा था—'पाताललोक स्वर्गलोकसे भी रमणीय है। वहाँ सुन्दर प्रभायुक्त चमकीली मणियाँ हैं, जो परम आनन्द प्रदान करनेवाली हैं। वे नागोंके अलंकारों एवं आभूषणोंके काम आती हैं। भला, पातालकी तुलना किससे हो सकती है। वहाँ सूर्यकी किरणें दिनमें केवल प्रकाश फैलाती हैं, धूप नहीं। इसी प्रकार चन्द्रमाकी किरणें रातमें केवल उजाला करती हैं, सर्दी नहीं फैलातीं। वहाँ सर्प और दैत्य आदि भक्ष्य, भोज्य तथा सुरापानके मदसे उन्मत्त होकर यह नहीं जान पाते कि कब कितना समय बीता है। वहाँ वन, नदियाँ, रमणीय सरोवर, कमलवन तथा अन्य मनोहर वस्तुएँ हैं, जो बड़े सौभाग्यसे भोगनेको मिलती हैं। पाताल-निवासी दानव, दैत्य तथा सर्पगण सदा ही उन सबका उपभोग करते हैं। सब पातालोंके नीचे भगवान् विष्णुका तमोमय विग्रह है, जिसे शेषनाग कहते हैं। दैत्य और दानव उनके गुणोंका वर्णन करनेमें समर्थ नहीं हैं। सिद्ध पुरुष उन्हें अनन्त कहते हैं, देवता और देवर्षि उनकी पूजा करते हैं। वे सहस्रों मस्तकोंसे सुशोभित हैं। स्वस्तिकाकार निर्मल आभूषण उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे अपने फणोंकी सहस्रों मणियोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रकाशित करते हैं तथा संसारका कल्याण करनेके लिये सम्पूर्ण असुरोंकी शक्ति हर लेते हैं। उनके कानोंमें एक ही कुण्डल शोभा पाता है। मस्तकपर किरीट और गलेमें मणियोंकी माला धारण किये भगवान् अनन्त अग्निकी ज्वालासे प्रकाशमान श्वेत पर्वतकी भाँति शोभा पाते। वे नील वस्त्र धारण करते, मदसे मत्त रहते और श्वेत हारसे ऐसे सुशोभित होते हैं, मानो आकाशगङ्गाके प्रपातसे युक्त उत्तम कैलास पर्वत शोभा पा रहा हो। उनके एक हाथका अग्रभाग हलपर टिका रहता है और दूसरे हाथमें वे उत्तम मूसल धारण किये हुए हैं। प्रलयकालमें विषाग्निकी ज्वालाओंसे युक्त संकर्षणात्मक रुद्र उन्हींके मुखोंसे निकलकर तीनों लोकोंका संहार करते हैं। सम्पूर्ण देवताओंसे पूजित वे भगवान् शेष पातालके मूलभागमें स्थित हो अपने मस्तकपर समस्त भूमण्डलको धारण किये रहते हैं। उनके वीर्य, प्रभाव, स्वरूप तथा रूपका वर्णन देवता भी नहीं कर सकते। जिनके मस्तकपर रखी हुई समूची पृथ्वी उनके फणोंकी मणियोंके प्रकाशसे लाल रंगकी फूलमाला-सी दिखायी देती है, उनके पराक्रमका वर्णन कौन कर सकता है? भगवान् अनन्त जब जँभाई लेते हैं, उस समय पर्वत, समुद्र और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी डोलने लगती है। गन्धर्व, अप्सरा, सिद्ध, किन्नर और सर्प—कोई भी उनके गुणोंका अन्त नहीं पाते; इसीलिये उन अविनाशी प्रभुको अनन्त कहते हैं। जिनके ऊपर नागवधुओंके हाथोंसे चढ़ाया हुआ हरिचन्दन

* पाताल और नरकोंका वर्णन तथा हरिनाम-कीर्तनकी महिमा * ५५

बारंबार श्वास-वायुके लगनेसे सम्पूर्ण दिशाओंको सुवासित करता रहता है, प्राचीन ऋषि गर्गने जिनकी आराधना करके सम्पूर्ण ज्योतिष-शास्त्रका यथार्थ ज्ञान प्राप्त किया था, उन्हीं नागश्रेष्ठ भगवान् शेषने इस पृथ्वीको धारण कर रखा है और वे ही देवता, असुर तथा मनुष्योंके सहित समस्त लोकोंका भरण-पोषण करते हैं।'

ब्राह्मणो! पातालके अनन्तर रौरव आदि नरक हैं, जिनमें पापियोंको गिराया जाता है। उन नरकोंके नाम बतलाता हूँ, सुनो। रौरव, शौकर, रोध, तान, विशसन, महाज्वाल, तप्तकुम्भ, महालोभ, विमोहन, रुधिरान्ध, वसातप्त, कृमीश, कृमिभोजन, असिपत्रवन, लालाभक्ष्य, पूयवह, वह्निज्वाल, अधःशिरा, संदंश, कृष्णसूत्र, तम, अवीचि, श्वभोजन, तथा अप्रतिष्ठ इत्यादि बहुत-से नरक हैं, जो अत्यन्त भयंकर हैं। ये सब यमके राज्यमें हैं। शस्त्र, अग्नि और विषके द्वारा यातना देनेके कारण वे सभी नरक अत्यन्त भयंकर हैं। जो मनुष्य पापकर्मोंमें लगे रहते हैं, वे ही उन नरकोंमें गिरते हैं। जो झूठी गवाही देता, पक्षपातपूर्वक बोलता तथा असत्य भाषण करता है, वह मनुष्य रौरव-नरकमें पड़ता है। जो गर्भके बच्चेकी हत्या कराता, गुरुके प्राण लेता, गायको मारता तथा दूसरोंके श्वास रोककर मार डालता है, वे सभी घोर रौरव नरकमें गिरते हैं। शराबी, ब्रह्महत्यारा, सुवर्णकी चोरी करनेवाला तथा इन पापियोंसे संसर्ग रखनेवाला मानव शौकर नरकमें जाता है। जो क्षत्रिय और वैश्यकी हत्या करता, गुरुपत्नीसे संसर्ग रखता, बहनके साथ व्यभिचार करता तथा राजदूतके प्राण लेता है, वह तप्तकुम्भ नामक नरकमें पड़ता है। जो शराब तथा सिंहको बेचता और अपने भक्तका त्याग करता है, वह तप्तलोह नामक नरकमें गिरता है। पुत्री और पुत्र-वधूके साथ समागम करनेवाला पापी महाज्वाल नामक नरकमें गिराया जाता है। जो नीच अपने गुरुजनोंका अपमान करता, उन्हें गालियाँ देता, वेदोंको दूषित करता, उन्हें बेचता तथा अगम्या स्त्रियोंके साथ समागम करता है, वे सभी शबल नामक नरकमें जाते हैं। चोर तथा मर्यादामें कलङ्क लगानेवाला मनुष्य विमोह नामक नरकमें गिरता है। देवताओं, द्विजों तथा पितरोंसे द्वेष रखनेवाला एवं रत्नको दूषित करनेवाला मनुष्य कृमिभक्ष्य नामक नरकमें पड़ता है। जो दूषित यज्ञ करता और देवताओं, पितरों एवं अतिथियोंको दिये बिना ही स्वयं खा लेता है, वह लालाभक्ष्य नामक भयंकर नरकमें जाता है। बाण बनानेवाला बेधक नामके नरकमें गिरता है। जो कर्णी नामक बाण तथा खड्ग आदि आयुधोंका निर्माण करता है। वह अत्यन्त भयंकर विशसन नामक नरकमें गिराया जाता है। जो द्विज नीच प्रतिग्रह स्वीकार करता है। यज्ञके अनधिकारियोंसे यज्ञ करवाता है तथा केवल नक्षत्र बताकर जीविका चलाता है, वह अधोमुख नामक नरकमें जाता है। जो अकेला ही मिठाई खाता है, वह मनुष्य कृमिपूय नामक नरकमें जाता है। लाख, मांस, रस, तिल और नमक बेचनेवाला ब्राह्मण भी उसी नरकमें पड़ता है। बिल्ली, मुर्गी, बकरा, कुत्ता, सूअर तथा चिड़िया पालनेवाला भी कृमिपूयमें ही गिरता है। जो ब्राह्मण रङ्गमञ्चपर नाचकर जीविका चलाता, नाव चलाता, जारज मनुष्यका अन्न खाता, दूसरोंको जहर देता, चुगली खाता, भैंससे जीविका चलाता, पर्वके दिन स्त्रीसम्भोग करता, दूसरोंके घरमें आग लगाता, मित्रोंकी हत्या करता, शकुन बताकर पैसे लेता, गाँवभरकी पुरोहिती करता

५६

* संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

तथा सोमरस बेचता है, वह रुधिरान्ध नामक नरकमें गिरता है। भाईको मारनेवाला और समूचे गाँवको नष्ट करनेवाला मनुष्य वैतरणी नदीमें जाता है। जो वीर्य पान करते, मर्यादा तोड़ते, अपवित्र रहते और बाजीगरीसे जीविका चलाते हैं, वे कृच्छ्र नामक नरकमें गिरते हैं। जो अकारण ही जंगल कटवाता है, वह असिपत्रवन नामक नरकमें जाता है। भेड़के व्यापारसे जीविका चलानेवाले और मृगोंका वध करनेवाले वह्निज्वाल नामक नरकमें गिराये जाते हैं। जो व्रतका लोप करनेवाले तथा अपने आश्रमसे भ्रष्ट हैं, वे दोनों ही संदंश-नरककी यातनामें पड़ते हैं। जो मनुष्य ब्रह्मचारी होकर दिनमें सोते और स्वप्नमें वीर्यपात करते हैं तथा जो लोग अपने पुत्रोंद्वारा पढ़ाये जाते हैं, वे श्वभोजन नामक नरकमें गिरते हैं। ये तथा और भी सहस्रों नरक हैं, जिनमें पापी मनुष्य यातनामें डालकर पीड़ित किये जाते हैं। ऊपर जो पाप गिनाये गये हैं, उनके अतिरिक्त दूसरे भी सहस्रों प्रकारके पाप हैं, जिनका फल नरकमें पड़े हुए पापी जीव भोगते हैं।

जो लोग मन, वाणी और क्रियाद्वारा अपने वर्ण और आश्रमके विपरीत आचरण करते हैं, वे नरकोंमें पड़ते हैं। नरकमें पड़े हुए जीव नीचे मुँह करके लटका दिये जाते हैं और उसी अवस्थामें वे स्वर्गमें सुख भोगनेवाले देवताओंको देखते हैं। इसी प्रकार देवता भी उक्त अवस्थामें पड़े हुए नरकके जीवोंको देखते रहते हैं। ऐसा होनेसे उनकी धर्मके प्रति श्रद्धा और पापके प्रति विरक्ति बढ़ती है। स्थावर, कीट, जलचर पक्षी, पशु, मनुष्य, धर्मात्मा, देवता तथा मोक्षप्राप्त महात्मा—ये क्रमशः एकसे दूसरे सहस्रगुने श्रेष्ठ हैं। महर्षियोंने पापोंके अनुरूप प्रायश्चित्त भी बतलाये हैं। स्वायम्भुव मनु आदि स्मृतिकारोंने बड़े पापके लिये बड़े और छोटे पापके लिये छोटे प्रायश्चित्त बतलाये हैं। वे सब तपस्यारूप हैं। तपस्यारूप जो समस्त प्रायश्चित्त हैं, उन सबमें भगवान् श्रीकृष्णका निरन्तर स्मरण श्रेष्ठ है। पाप कर लेनेपर जिस पुरुषको उसके लिये पश्चात्ताप होता है, उसके लिये एक बार भगवान् श्रीहरिका स्मरण कर लेना ही सर्वोत्तम प्रायश्चित्त है। प्रातःकाल, रात्रि, संध्या तथा मध्याह्न आदिमें भगवान् नारायणका स्मरण करनेवाला मनुष्य तत्काल पापमुक्त हो जाता है। भगवान् विष्णुके स्मरण और कीर्तनसे समस्त क्लेशराशिके क्षीण हो जानेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। विप्रवरो ! जप, होम और अर्चन आदिके समय जिसका मन भगवान् वासुदेवमें लगा होता है, वह तो मोक्षका अधिकारी है। उसके लिये फलरूपसे इन्द्र आदिके पदकी प्राप्ति विघ्नमात्र है। कहाँ तो जहाँसे पुनः लौटना पड़ता है, ऐसे स्वर्गलोकमें जाना और कहाँ मोक्षके सर्वोत्तम बीज वासुदेवमन्त्रका जप! इनमें कोई तुलना ही नहीं है।* इसलिये जो पुरुष रात-दिन भगवान् विष्णुका स्मरण करता है, वह


* प्रायश्चित्तान्यशेषाणि तपःकर्मात्मकानि वै। यानि तेषामशेषाणां कृष्णानुस्मरणं परम्॥
कृते पापेऽनुतापो वै यस्य पुंसः प्रजायते। प्रायश्चित्तं तु तस्यैकं हरिसंस्मरणं परम्॥
प्रातर्निशि तथा संध्यामध्याह्नादिषु संस्मरन्। नारायणमवाप्नोति सद्यः पापक्षयं नरः॥
विष्णुसंस्मरणात् क्षीणसमस्तक्लेशसंचयः। मुक्तिं प्रयाति भो विप्रा विष्णोस्तस्यानुकीर्तनात्॥
वासुदेवे मनो यस्य जपहोमार्चनादिषु। तस्यान्तरायो विप्रेन्द्रा देवेन्द्रत्वादिकं फलम्॥
क्व नाकपृष्ठगमनं पुनरावृत्तिलक्षणम्। क्व जपो वासुदेवेति मुक्तिबीजमनुत्तमम्॥
(२२।३७–४२)

१३- ग्रहों तथा भुवः आदि लोकोंकी स्थिति, श्रीविष्णुशक्तिका प्रभाव तथा शिशुमारचक्रका वर्णन

* ग्रहों तथा भुवः आदि लोकोंकी स्थिति, श्रीविष्णुशक्तिका प्रभाव तथा शिशुमारचक्रका वर्णन * ५७

अपने समस्त पातकोंका नाश हो जानेके कारण कभी नरकमें नहीं पड़ता। एक ही वस्तु समय-समयपर दुःख-सुख, ईर्ष्या और क्रोधका कारण बनती है। अतः केवल दुःखरूप वस्तु कहाँसे आयी? वही वस्तु पहले प्रसन्नताका कारण होकर फिर दुःख देनेवाली बन जाती है। फिर वही क्रोध और प्रसन्नताका भी हेतु बनती है। इसलिये कोई भी वस्तु न तो दुःखरूप है न सुखरूप। यह सुख और दुःख आदि तो मनका विकारमात्र है।* ज्ञान ही परब्रह्मका स्वरूप है और अज्ञान बन्धनका कारण है। यह सम्पूर्ण विश्व ज्ञानस्वरूप है। ज्ञानसे बढ़कर कुछ भी नहीं है। ब्राह्मणो! विद्या और अविद्याको भी ज्ञानरूप ही समझो। इस प्रकार मैंने तुमसे समस्त भूमण्डल, पाताल, नरक, समुद्र, पर्वत, द्वीप, वर्ष तथा नदियोंका संक्षेपसे वर्णन किया। अब और क्या सुनना चाहते हो?


ग्रहों तथा भुवः आदि लोकोंकी स्थिति, श्रीविष्णुशक्तिका प्रभाव तथा शिशुमारचक्रका वर्णन

मुनियोंने कहा— महाभाग लोमहर्षणजी! अब हम भुवः आदि लोकोंका, ग्रहोंकी स्थितिका तथा उनके परिमाणका यथार्थ वर्णन सुनना चाहते हैं। आप कृपापूर्वक बतलायें।

लोमहर्षणजी बोले— सूर्य और चन्द्रमाकी किरणोंसे समुद्र, नदी और पर्वतोंसहित जितने भागमें प्रकाश फैलता है, उतने भागको पृथ्वी कहते हैं। पृथ्वी विस्तृत होनेके साथ ही गोलाकार है। पृथ्वीसे एक लाख योजन ऊपर सूर्यमण्डलकी स्थिति है और सूर्यमण्डलसे लाख योजन दूर चन्द्रमण्डल स्थित है। चन्द्रमण्डलसे लाख योजन ऊपर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डल प्रकाशित होता है। नक्षत्रमण्डलसे दो लाख योजन ऊँचे बुधकी स्थिति है। बुधसे दो लाख योजन ऊपर शुक्र स्थित हैं। शुक्रसे दो लाख योजन मङ्गल तथा मङ्गलसे दो लाख योजन ऊँचे देवगुरु बृहस्पति स्थित हैं। बृहस्पतिसे दो लाख योजन ऊपर शनैश्चर हैं और उनसे एक लाख योजन ऊँचे सप्तर्षिमण्डल स्थित है। सप्तर्षियोंसे लाख योजन ऊपर ध्रुव हैं, जो समस्त ज्योतिर्मण्डलके केन्द्र हैं। ध्रुवसे ऊपर महर्लोक है, जहाँ एक कल्पतक जीवित रहनेवाले महात्मा पुरुष निवास करते हैं। उसका विस्तार एक करोड़ योजन है। उसके ऊपर जनलोक है, जिसका विस्तार दो करोड़ योजन है। वहीं शुद्ध अन्तःकरणवाले ब्रह्मकुमार सनन्दन आदि महात्मा वास करते हैं। जनलोकसे ऊपर उससे चौगुने विस्तारवाला तपोलोक स्थित है, जहाँ शरीररहित वैराज आदि देवता रहते हैं। तपोलोकसे ऊपर सत्यलोक प्रकाशित होता है, जो उससे छः गुना बड़ा है। वहाँ सिद्ध आदि एवं मुनिजन निवास करते हैं। वह पुनर्जन्म एवं पुनर्मृत्युका निवारण करनेवाला लोक है। जहाँतक पैरोंसे जाने योग्य पार्थिव वस्तु है, उसे भूलोक कहा गया है; उसका विस्तार पहले बताया जा चुका है। भूमि और


* वस्त्वेकमेव दुःखाय सुखायेर्ष्यादयाय च। कोपाय च यतस्तस्माद् वस्तु दुःखात्मकं कुतः॥
तदेव प्रीतये भूत्वा पुनर्दुःखाय जायते। तदेव कोपाय यतः प्रसादाय च जायते॥
तस्माद्दुःखात्मकं नास्ति न च किञ्चित्सुखात्मकम्। मनसः परिणामोऽयं सुखदुःखादिलक्षणः॥
(२२।४५—४७)

५८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

सूर्यके बीचमें जो सिद्ध एवं मुनियोंसे सेवित प्रदेश है, वह भुवर्लोक कहा गया है। यही दूसरा लोक है। ध्रुव और सूर्यके बीचमें जो चौदह लाख योजन विस्तृत स्थान है, उसे लोक-स्थितिका विचार करनेवाले पुरुषोंने स्वर्गलोक बतलाया है। भूः, भुवः और स्वः—इन्हीं तीनोंको त्रैलोक्य कहते हैं। विद्वान् ब्राह्मण इन तीनों लोकोंको कृतक (नाशवान्) कहते हैं। इसी प्रकार ऊपरके जो जन, तप और सत्य नामक लोक हैं, वे तीनों अकृतक (अविनाशी) कहलाते हैं। कृतक और अकृतकके बीचमें महर्लोक है, जो कृतकाकृतक कहलाता है। यह कल्पान्तमें जनशून्य हो जाता है, किंतु नष्ट नही होता। ब्राह्मणो! इस प्रकार ये सात महालोक बतलाये गये हैं। पाताल भी सात ही हैं। यही समूचे ब्रह्माण्डका विस्तार है।

यह ब्रह्माण्ड ऊपर, नीचे तथा किनारेकी ओरसे अण्डकटाहद्वारा घिरा हुआ है—ठीक उसी तरह, जैसे कैथका बीज सब ओर छिलकेसे ढका रहता है। उसके बाद समूचे अण्डकटाहसे दसगुने विस्तारवाले जलके आवरणद्वारा यह ब्रह्माण्ड आवृत है। इसी प्रकार जलका आवरण भी बाहरकी ओरसे अग्निमय आवरणद्वारा घिरा हुआ है। अग्नि वायुसे, वायु आकाशसे और आकाश महत्तत्त्वसे आवृत है। इस प्रकार ये सातों आवरण उत्तरोत्तर दसगुने बड़े हैं। महत्तत्त्वको आवृत करके प्रधान—प्रकृति स्थित है। प्रधान अनन्त है। उसका अन्त नहीं है और न उसके मापकी कोई संख्या ही है। वह अनन्त एवं असंख्यात बताया गया है। वही सम्पूर्ण जगत्का उपादान है। उसे ही परा प्रकृति कहा गया है। उसके भीतर ऐसे-ऐसे कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड स्थित हैं। जैसे लकड़ीमें आग और तिलमें तेल व्याप्त रहता है, उसी प्रकार प्रधान अर्थात् प्रकृतिमें चेतन पुरुष व्याप्त है। ये प्रकृति और पुरुष एक-दूसरेके आश्रित हो भगवान् विष्णुकी शक्तिसे टिके हुए हैं। श्रीविष्णुकी शक्ति ही प्रकृति और पुरुषके पृथक् एवं संयुक्त होनेमें कारण है। विप्रवरो! वही सृष्टिके समय प्रकृतिमें क्षोभका कारण होती है। जैसे वायु जलके कणोंसे रहनेवाली शीतलताको धारण करती है, उसी प्रकार भगवान् विष्णुकी शक्ति प्रकृति-पुरुषरूप सम्पूर्ण जगत्‌को धारण करती है। जैसे प्रथम बीजसे मूल, तने और शाखा आदिसहित विशाल वृक्ष उत्पन्न होता है, फिर उस वृक्षसे अन्यान्य बीज प्रकट होते हैं और उन बीजोंसे भी पहले ही-जैसे वृक्ष उत्पन्न होते रहते हैं, उसी प्रकार पहले अव्याकृत प्रकृतिसे महत्तत्त्व आदि उत्पन्न होते हैं, फिर उनसे देवता आदि प्रकट होते हैं, देवताओंसे उनके पुत्र और उन पुत्रोंके भी पुत्र होते रहते हैं। जैसे एक वृक्षसे दूसरा वृक्ष उत्पन्न होनेपर पहले वृक्षकी कोई हानि नहीं होती, उसी प्रकार नूतन भूतोंकी सृष्टिसे भूतोंका ह्रास नहीं होता। जैसे समीपवर्ती होनेमात्रसे आकाश और काल आदि भी वृक्षके कारण हैं, उसी प्रकार भगवान् श्रीहरि स्वयं विकृत न होते हुए ही सम्पूर्ण विश्वके कारण होते हैं। जैसे धानके बीजमें जड़, नाल, पत्ते, अङ्कुर, काण्ड, कोप, फूल, दूध, चावल, भूसी और कन—सभी रहते हैं तथा अङ्कुरित होनेके योग्य कारण-सामग्री पाकर प्रकट हो जाते हैं, उसी प्रकार भिन्न-भिन्न कर्मोंमें देव आदि सभी शरीर स्थित रहते हैं तथा कारणभूत श्रीविष्णुशक्तिका सहारा पाकर प्रकट हो जाते हैं।

वे भगवान् विष्णु परब्रह्म हैं; उन्हींसे यह सम्पूर्ण जगत् उत्पन्न हुआ है, वे ही जगत्स्वरूप हैं तथा उन्हींमें इस जगत्का लय होगा। वे परब्रह्म और परम धामस्वरूप हैं, सत् और असत् भी वे

  • ग्रहों तथा भुवः आदि लोकोंकी स्थिति, श्रीविष्णुशक्तिका प्रभाव तथा शिशुमारचक्रका वर्णन * ५९

ही हैं, वे ही परम पद हैं। यह सम्पूर्ण चराचर जगत् उनसे भिन्न नहीं है। वे ही अव्याकृत मूल प्रकृति और व्याकृत जगत्स्वरूप हैं। यह सब कुछ उन्हींमें लय होता और उन्हींके आधारपर स्थित रहता है। वे ही क्रियाओंके कर्ता (यजमान) हैं, उन्हींका यज्ञोंद्वारा यजन किया जाता है, यज्ञ और उसके फल भी वे ही हैं। युग आदि सब कुछ उन्हींसे प्रवृत्त होता है। उन श्रीहरिसे भिन्न कुछ भी नहीं है।*

लोमहर्षणजी कहते हैं— आकाशमें शिशुमार (गोह)-के आकारमें जो भगवान्‌का तारामय स्वरूप है, उसके पुच्छभागमें ध्रुवकी स्थिति है। ध्रुव स्वयं अपनी परिधिमें भ्रमण करते हुए सूर्य, चन्द्र आदि अन्य ग्रहोंको भी घुमाते हैं। ध्रुवके घूमनेपर उनके साथ ही समस्त नक्षत्र चक्रकी भाँति घूमने लगते हैं। सूर्य, चन्द्रमा, तारे, नक्षत्र और ग्रह—ये सभी वायुमयी डोरीसे ध्रुवमें बँधे हुए हैं। शिशुमारके आकारका आकाशमें जो तारामय रूप बताया गया है, उसके आधार परम धामस्वरूप साक्षात् भगवान् नारायण हैं, जो शिशुमारके हृदय-देशमें स्थित हैं। देवता, असुर और मनुष्योंसहित यह सम्पूर्ण जगत् भगवान् नारायणके ही आधारपर टिका हुआ है। सूर्य आठ महीनोंमें अपनी किरणोंद्वारा रसात्मक जलका संग्रह करते हैं और उसे वर्षाकालमें बरसा देते हैं। उस वृष्टिके जलसे अन्न पैदा होता है और अन्नसे सम्पूर्ण जगत्‌का भरण-पोषण होता है। सूर्य अपनी तीखी किरणोंसे जगत्‌का जल लेकर उसके द्वारा चन्द्रमाकी पुष्टि करते हैं। धूम, अग्नि और वायुरूप मेघोंमें स्थापित किया हुआ जल अपभ्रष्ट नहीं होता, अतएव मेघोंको अभ्र कहते हैं। वायुकी प्रेरणासे मेघस्थ जल पृथ्वीपर गिरता है। नदी, समुद्र, पृथ्वी तथा प्राणियोंके शरीरसे निकला हुआ—ये चार प्रकारके जल सूर्य अपनी किरणोंद्वारा ग्रहण करते हैं और उन्हींको समयपर बरसाते हैं। इसके सिवा वे आकाशगङ्गाके जलको भी लेकर उसे बादलोंमें स्थापित किये बिना ही शीघ्र पृथ्वीपर बरसा देते हैं। उस जलका स्पर्श होनेसे मनुष्यके पाप-पङ्क धुल जाते हैं, जिससे वह नरकमें नहीं पड़ता। यह दिव्य स्नान माना गया है। कृत्तिका आदि विषम नक्षत्रोंमें सूर्यके दिखायी देते हुए आकाशसे जो जल गिरता है, उसे दिग्गजोंद्वारा फेंका हुआ आकाशगङ्गाका जल समझना चाहिये। इसी प्रकार भरणी आदि सम संख्यावाले नक्षत्रोंमें सूर्यके दिखायी देते हुए आकाशसे जो जल गिरता है, वह भी आकाशगङ्गाका ही जल है, जिसे सूर्यकी किरणें तत्काल ले आकर बरसाती हैं। यह दोनों ही प्रकारका जल अत्यन्त पवित्र और मनुष्योंका पाप दूर करनेवाला है। आकाशगङ्गाके जलका स्पर्श दिव्य स्नान है। बादलोंके द्वारा जो जलकी वर्षा होती है, वह प्राणियोंके जीवनके लिये सब प्रकारके अन्न आदिकी पुष्टि करती है। अतः वह जल अमृत माना गया है। उसके द्वारा अत्यन्त पुष्ट हुई सब प्रकारकी ओषधियाँ फलती, पकती एवं प्रजाके उपयोगमें आती हैं। उन ओषधियोंसे शास्त्रदर्शी मनुष्य प्रतिदिन विहित यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंको तृप्त करते हैं। इस प्रकार यज्ञ, वेद,


* स च विष्णुः परं ब्रह्म यतः सर्वमिदं जगत्। जगच्च यो यत्र चेदं यस्मिन् विलयमेष्यति॥
तद् ब्रह्म परमं धाम सदसत्परमं पदम्। यस्य सर्वमभेदेन जगदेतच्चराचरम्॥
स एव मूलप्रकृतिर्व्यक्तरूपी जगच्च सः। तस्मिन्नेव लयं सर्वं याति तत्र च तिष्ठति॥
कर्ता क्रियाणां स च इज्यते क्रतुः स एव तत्कर्मफलं च तस्य यत्। युगादि यस्माच्च भवेदशेषतो हरेर्न किञ्चिद् व्यतिरिक्तमस्ति तत्॥
(२३।४१-४४)

१४- तीर्थ-वर्णन

६० * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

ब्राह्मण आदि वर्ण, सम्पूर्ण देवता, पशु, भूतगण तथा स्थावर-जङ्गमस्वरूप सम्पूर्ण जगत्—ये सब वृष्टिके द्वारा ही धारण किये गये हैं। वृष्टि सूर्यके द्वारा होती है। सूर्यके आधार ध्रुव, ध्रुवके शिशुमारचक्र तथा शिशुमारचक्रके आश्रय साक्षात् भगवान् नारायण हैं। वे शिशुमारचक्रके हृदय-देशमें स्थित हैं। वे ही सम्पूर्ण भूतोंके आदि, पालक तथा सनातन प्रभु हैं। मुनिवरो! इस प्रकार मैंने पृथ्वी, समुद्र आदिसे युक्त ब्रह्माण्डका वर्णन किया। अब और क्या सुनना चाहते हो?


तीर्थ-वर्णन

**मुनियोंने कहा—**धर्मके ज्ञाता सूतजी! पृथ्वीपर जो-जो पवित्र तीर्थ और मन्दिर हैं, उनका वर्णन कीजिये। इस समय हमारे मनमें उन्हींका वर्णन सुननेकी इच्छा है।

**लोमहर्षणजी बोले—**जिसके हाथ, पैर और मन काबूमें हों तथा जिसमें विद्या, तप और कीर्ति हो, वह मनुष्य तीर्थके फलका भागी होता है। पुरुषका शुद्ध मन, शुद्ध वाणी तथा वशमें की हुई इन्द्रियाँ—ये शारीरिक तीर्थ हैं, जो स्वर्गका मार्ग सूचित करती हैं। भीतरका दूषित चित्त तीर्थस्नानसे शुद्ध नहीं होता। जिसका अन्तःकरण दूषित है, जो दम्भमें रुचि रखता है तथा जिसकी इन्द्रियाँ चञ्चल हैं, उसे तीर्थ, दान, व्रत और आश्रम भी पवित्र नहीं कर सकते। मनुष्य इन्द्रियोंको अपने वशमें करके जहाँ-जहाँ निवास करता है, वहीं-वहीं कुरुक्षेत्र, प्रयाग और पुष्कर आदि तीर्थ वास करने लगते हैं। द्विजवरो! अब मैं पृथ्वीके पवित्र तीर्थों और मन्दिरोंका संक्षेपसे वर्णन आरम्भ करता हूँ, सुनो। पुष्कर, नैमिषारण्य, प्रयाग, धर्मारण्य, धेनुक, चम्पकारण्य, सैन्धवारण्य, मगधारण्य, दण्डकारण्य, गया, प्रभास, श्रीतीर्थ, कनखल, भृगुतुङ्ग, हिरण्याक्ष, भीमारण्य, कुशस्थली, लोहाकुल, केदार, मन्दारण्य, महाबल, कोटितीर्थ, रूपतीर्थ, शूकर, चक्रतीर्थ, योगतीर्थ, सोमतीर्थ शाखोटक, कोकामुख, बदरीशैल, तुङ्गकूट, स्कन्दाश्रम, अग्निपद, पञ्चशिख, धर्मोद्भव, बन्धप्रमोचन, गङ्गाद्वार, पञ्चकूट, मध्यकेसर, चक्रप्रभ, मतङ्ग, कुशदण्ड, दंष्ट्राकुण्ड, विष्णुतीर्थ, सार्वकामिकतीर्थ, मत्स्यतिल, ब्रह्मकुण्ड, वह्निकुण्ड, सत्यपद, चतुःस्रोत, चतुःशृङ्ग, द्वादशधार, मानस, स्थूलशृङ्ग, स्थूलदण्ड, उर्वशी, लोकपाल, मनुवर, सोमशैल, सदाप्रभ, मेरुकुण्ड, सोमाभिषेचनतीर्थ, महास्रोत, कोटरक, पञ्चधार, त्रिधार, सप्तधार, एकधार, अमरकण्टक, शालग्राम, कोटिद्रुम, बिल्वप्रभ, देवह्रद, विष्णुह्रद, शङ्खप्रभ, देवकुण्ड, वज्रायुध, अग्निप्रभ, पुंनाग, देवप्रभ, विद्याधरतीर्थ, गान्धर्वतीर्थ, मणिपूर गिरि, पञ्चह्रद, पिण्डारक, मलव्य, गोप्रभाव, गोवर, वटमूल, स्नानदण्ड, विष्णुपद, कन्याश्रम, वायुकुण्ड, जम्बूमार्ग, गभस्तीतीर्थ, यजातिपतन, भद्रवट, महाकालवन, नर्मदातीर्थ, तीर्थवज्र, अर्बुद, पिङ्गतीर्थ, वासिष्ठीतीर्थ, पृथुसंगम, दौर्वासिक, पिञ्जरक, ऋषितीर्थ, ब्रह्मतुङ्ग, वसुतीर्थ, कुमारिक, शक्रतीर्थ, पञ्चनद, रेणुकातीर्थ, पैतामह, विमलतीर्थ, रुद्रपाद, मणिमान्, कामाख्य, कृष्णतीर्थ, कुलिङ्गक, यजनतीर्थ, याजनतीर्थ, ब्रह्मवालुक, पुष्पन्यास, पुण्डरीक, मणिपूर, दीर्घसत्र, हयपद, अनशनतीर्थ, गङ्गोद्भेद, शिवोद्भेद, नर्मदोद्भेद, वस्त्रापद, दारुबल, छायारोहण, सिद्धेश्वर, मित्रबल, कालिकाश्रम, वटावट, भद्रवट, कौशाम्बी, दिवाकर, सारस्वतद्वीप, विजयतीर्थ,

  • तीर्थ-वर्णन * ६१

कामदतीर्थ, रुद्रकोटि, सुमनस्तीर्थ, समन्तपञ्चक, ब्रह्मतीर्थ, सुदर्शनतीर्थ, पारिप्लव, पृथूदक, दशाश्वमेधिक, साक्षिद, विजय, पञ्चनद, वाराह, यक्षिणीह्रद, पुण्डरीक, सोमतीर्थ, मुञ्जवट, बदरीवन, रत्नमूलक, स्वर्लोकद्वार, पञ्चतीर्थ, कपिलातीर्थ, सूर्यतीर्थ, शङ्खिनीतीर्थ, गोभवनतीर्थ, यक्षराजतीर्थ, ब्रह्मावर्त, कामेश्वर, मातृतीर्थ, शीतवनतीर्थ, स्नानलोमापह, माससंसरक, केदार, ब्रह्मोदुम्बर, सप्तर्षिकुण्ड, देवीतीर्थ, जम्बुकतीर्थ, ईहास्पद, कोटिकूट, किंदान, किंजय, कारण्डव, अवेध्य, त्रिविष्टप, पाणिखात, मिश्रक, मधुवट, मनोजव, कौशिकीतीर्थ, देवतीर्थ, ऋणमोचनतीर्थ, नृग्धूम, अमरह्रद, श्रीकुञ्ज, शालितीर्थ, नैमिषेयतीर्थ, ब्रह्मस्थान, कन्यातीर्थ, मनसतीर्थ, कारुपावनतीर्थ, सौगन्धिकवन, मणितीर्थ, सरस्वतीतीर्थ, ईशानतीर्थ, पाञ्चयज्ञिकतीर्थ, त्रिशूलधार, माहेन्द्र, देवस्थान, कृतालय, शाकम्भरी, देवतीर्थ, सुवर्णतीर्थ, कलिह्रद, क्षीरस्रव, विरूपाक्ष, भृगुतीर्थ, कुशोद्भवतीर्थ, ब्रह्मयोनि, नीलपर्वत, कुब्जाम्बक, वसिष्ठपद, स्वर्गद्वार, प्रजाद्वार, कलिकाश्रम, रुद्रावर्त, सुगन्धाश्व, कपिलावन, भद्रकर्णह्रद, शङ्कुकर्णह्रद, सप्तसारस्वत, औशनसतीर्थ, कपालमोचन, अवकीर्ण, काम्यक, चतुःसामुद्रिक, शतिक, सहस्रिक, रेणुक, पञ्चवटक, विमोचन, स्थाणुतीर्थ, कुरुतीर्थ, कुशध्वज, विश्वेश्वर, मानवकूप, नारायणाश्रम, गङ्गाह्रद, बदरीपावन, इन्द्रमार्ग, एकरात्र, क्षीरकावास, दधीच, श्रुततीर्थ, कोटितीर्थस्थली, भद्रकालीह्रद, अरुन्धतीवन, ब्रह्मावर्त, अश्ववेदी, कुब्जावन, यमुनाप्रभव, वीर, प्रमोक्ष, सिन्धूत्थ, ऋषिकुल्या, कृत्तिका, उर्वीसंक्रमण, मायाविद्योद्भव, महाश्रम, वेतसिका, सुन्दरिकाश्रम, बाहुतीर्थ, चारुनदी, विमलाशोक, मार्कण्डेयतीर्थ, सितोद, मत्स्योदरी, सूर्यप्रभ, अशोकवन, अरुणास्पद, शुक्रतीर्थ, वालुकातीर्थ, पिशाचमोचन, सुभद्राह्रद, विरलदण्डकुण्ड, चण्डेश्वरतीर्थ, ज्येष्ठस्थानह्रद, ब्रह्मसर, जैगीषव्यगुहा, हरिकेशवन, अजामुखसर, घण्टाकर्णह्रद, कर्कोटकवापी, सपर्णास्योदपान, श्वेततीर्थह्रद, घर्घिरिकाकुण्ड, श्यामाकूप, चन्द्रिकातीर्थ, श्मशानस्तम्भकूप, विनायकह्रद, सिन्धूद्भवकूप, ब्रह्मसर, रुद्रावास, नागतीर्थ, पुलोमतीर्थ, भक्तह्रद, क्षीरसर, प्रेताधार, कुमारतीर्थ, कुशावर्त, दधिकर्णोदपानक, शृङ्गीतीर्थ, महातीर्थ, महानदी, गयशीर्ष, अक्षयवट, कपिलाह्रद, गृध्रवट, सावित्रीह्रद, प्रभासन, शीतवन, योनिद्वार, धन्यक, कोकिलातीर्थ, मतङ्गह्रद, पितृकूप, सप्तकुण्ड, मणिरत्नह्रद, कौशिक्यतीर्थ, भरततीर्थ, ज्येष्ठालीकातीर्थ, कल्पसर, कुमारधारा, श्रीधारा, गौरीशिखर, शुनःकुण्ड, नन्दितीर्थ, कुमारवास, श्रीवास, कुम्भकर्णह्रद, कौशिकीह्रद, धर्मतीर्थ, कामतीर्थ, उद्दालकतीर्थ, संध्यातीर्थ, लोहितार्णव, शोणोद्भव, वंशगुल्म, ऋषभ, कालतीर्थ, पुण्यावर्तिह्रद, बदरिकाश्रम, रामतीर्थ, पितृवन, विरजातीर्थ, कृष्णतीर्थ, कृष्णवट, रोहिणीकूप, इन्द्रद्युम्नसरोवर, सानुगर्त, माहेन्द्र, श्रीनद, इषुतीर्थ, वार्षभतीर्थ, कावेरीह्रद, गोकर्ण, गायत्रीस्थान, बदरीह्रद, मध्यस्थान, विकर्णक, जातीह्रद, देवकूप, कुशप्रथन, सर्वदेवव्रत, कन्याश्रमह्रद, वालखिल्यह्रद तथा अखण्डितह्रद—ये सब पवित्र तीर्थ हैं। जो मनुष्य इन तीर्थोंमें उत्तम श्रद्धासे सम्पन्न हो उपवास एवं इन्द्रियसयंमपूर्वक विधिवत् स्नान, देवता, ऋषि, मनुष्य तथा पितरोंका तर्पण, देवताओंका पूजन एवं तीन रात्रितक निवास करता है, वह प्रत्येक तीर्थके पृथक्-पृथक् फलरूपसे अश्वमेध-यज्ञका पुण्य प्राप्त करता है—इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। जो प्रतिदिन इस उत्तम तीर्थ-माहात्म्यको सुनता, पढ़ता अथवा सुनाता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।