संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 434 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *
भी दक्षिण उत्तरकुरु है। इन छहों वर्षोंके बीचमें इलावृतवर्ष है, जिसके मध्यभागमें सुवर्णमय ऊँचा मेरुपर्वत खड़ा है। यह वर्ष मेरुके चारों ओर नौ हजार योजनतक फैला हुआ है। उसमें मेरुसे पूर्व मन्दराचल, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें विपुल तथा उत्तरमें सुपार्श्वपर्वतकी स्थिति है। इन चारों पर्वतोंपर क्रमशः—कदम्ब, जम्बू, पीपल और वट—ये चार वृक्ष हैं, जो ग्यारह-ग्यारह सौ योजन विस्तारके हैं। वे वृक्ष उन पर्वतोंकी ध्वजाके रूपमें सुशोभित हैं। वह जम्बू-वृक्ष ही इस द्वीपके जम्बूद्वीप नाम पड़नेका कारण है। उसके फल विशाल गजराजके बराबर होते हैं। वे गन्धमादनपर्वतपर सब ओर गिरकर फूट जाते हैं। उनके रससे वहाँ जम्बू नामकी नदी बहती है। वहाँके निवासी उसी नदीका जल पीते हैं। उसके पीनेसे लोगोंके शरीर और मन स्वस्थ रहते हैं। उन्हें खेद नहीं होता। उनके शरीरमें दुर्गन्ध नहीं होती तथा उनकी इन्द्रियाँ कभी क्षीण नहीं होती। जम्बूके रसको पाकर उस नदीके तटकी मिट्टी जाम्बूनद नामक सुवर्णके रूपमें परिणत हो जाती है, जो सिद्धोंके आभूषणके काम आती है। मेरुसे पूर्व भद्राश्व और पश्चिममें केतुमालवर्ष हैं। इन दोनोंके बीचमें इलावृतवर्ष है। मेरुके पूर्व चैत्ररथ, दक्षिणमें गन्धमादन, पश्चिममें वैभ्राज तथा उत्तरमें नन्दनवन है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न दिशाओंमें अरुणोद, महाभद्र, असितोद तथा मानस—ये चार सरोवर हैं, जो सदा देवताओंके उपभोगमें आते हैं। शान्तवान्, चक्रकुञ्ज, कुररी, माल्यवान् तथा वैकङ्क आदि पर्वत मेरुके पूर्वभागमें केसराचलके रूपमें स्थित हैं। त्रिकूट, शिशिर, पतङ्ग, रुचक तथा निषध आदि दक्षिणभागके केसर-पर्वत हैं। शिखिवास, वैदूर्य, कपिल, गन्धमादन और जारुधि आदि पश्चिमभागके केसराचल हैं। शङ्खकूट, ऋषभ, हंस, नाग तथा कालञ्जर आदि अन्य पर्वत उत्तरभागके केसराचल हैं। मेरुगिरिके ऊपर चौदह हजार योजनके विस्तारवाली एक विशाल पुरी है, जो ब्रह्माजीकी सभा कहलाती है। उसमें सब ओर आठों दिशाओं और विदिशाओंमें इन्द्र आदि लोकपालोंके विख्यात नगर हैं।
भगवान् विष्णुके चरणोंसे निकलकर चन्द्रमण्डलको आप्लावित करनेवाली गङ्गा ब्रह्मपुरीके चारों ओर गिरती हैं। वहाँ गिरकर वे चार भागोंमें बँट जाती हैं। उस समय उनके क्रमशः—सीता, अलकनन्दा, चक्षु और भद्रा नाम होते हैं। पूर्व ओर सीता एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर होती हुई पूर्ववर्ती भद्राश्ववर्षके मार्गसे समुद्रमें जा मिलती है। इसी प्रकार अलकनन्दा दक्षिण-पथसे भारतवर्षमें आती और वहाँ सात भेदोंमें विभक्त होकर समुद्रमें मिल जाती है। चक्षुकी धारा पश्चिमके सम्पूर्ण पर्वतोंको लाँघकर केतुमालवर्षमें आती और समुद्रमें मिल जाती है। इसी प्रकार भद्रा उत्तरगिरि तथा उत्तरकुरुको लाँघकर उत्तरसमुद्रमें मिलती है। माल्यवान् और गन्धमादनपर्वत नीलगिरिसे लेकर निषधपर्वततक फैले हुए हैं। उन दोनोंके मध्यभागमें मेरु कर्णिकाके आकारमें स्थित है। भारत, केतुमाल, भद्राश्व तथा कुरु—ये द्वीप लोकरूपी कमलके पत्र हैं। जठर और देवकूट—ये दो मर्यादा-पर्वत हैं। ये नीलसे निषध पर्वततक उत्तर-दक्षिण फैले हुए हैं। ये दोनों मेरुके पश्चिमभागमें पूर्ववत् स्थित हैं। त्रिशृङ्ग और जारुधि—ये उत्तर-दिशाके वर्षपर्वत हैं, जो पूर्वसे पश्चिम ओर समुद्रके भीतरतक चले गये हैं। ब्राह्मणो! इस प्रकार मैंने मर्यादापर्वतोंका वर्णन किया, जो मेरुके चारों ओर दो-दो करके स्थित हैं। मेरुपर्वतके सब ओर जो केसरपर्वत बतलाये गये हैं, उनकी गुफाएँ बड़ी मनोहर हैं, जिनमें सिद्ध और चारण निवास करते हैं। वहाँ सुरम्य