भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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* जम्बूद्वीप तथा उसके विभिन्न वर्षोंसहित भारतवर्षका वर्णन * ४९

वन और नगर हैं। लक्ष्मी, विष्णु, अग्नि, सूर्य तथा इन्द्र आदि देवताओंके बड़े-बड़े मन्दिर हैं, जो किन्नरोंसे सेवित हैं। उन पर्वतोंकी रमणीय गुफाओंमें गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, दैत्य और दानव दिन-रात विहार किया करते हैं। वे पर्वत इस पृथ्वीके स्वर्ग माने गये हैं। वहाँ धर्मात्माओंका निवास है, पापी मनुष्य सैकड़ों जन्म धारण करनेपर भी वहाँ नहीं जा सकते। भद्राश्ववर्षमें भगवान् विष्णु हयग्रीवरूपसे विराजमान हैं। केतुमालमें वाराह, भारतवर्षमें कच्छप तथा उत्तरकुरुमें मत्स्यरूप धारण करके रहते हैं। सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि सर्वस्वरूप हैं तथा विश्वरूपमें वे सर्वत्र सुशोभित होते हैं। अखिल जगत्स्वरूप भगवान् विष्णु सबके आधारभूत हैं। किम्पुरुष आदि जो आठ वर्ष हैं, उनमें शोक, आयास, उद्वेग तथा क्षुधाका भय आदि दोष नहीं हैं। वहाँकी प्रजा सब प्रकारसे स्वस्थ निर्भय तथा सब प्रकारके दुःखोंसे रहित हैं। उन सबकी स्थिर आयु दस-बारह हजार वर्षोंतककी होती है। इन स्थानोंमें पृथ्वीके क्षुधा, पिपासा आदि अन्य दोष भी नहीं प्रकट होते। इन सभी वर्षोंमें सात-सात कुल-पर्वत हैं, जिनसे सैकड़ों नदियाँ प्रकट हुई हैं।

समुद्रके उत्तर और हिमालयके दक्षिणका जो देश है, उसका नाम भारतवर्ष है। उसीमें राजा भरतकी संतान तथा प्रजा रहती है। उसका विस्तार नौ हजार योजन है। भारतवर्ष कर्मभूमि है। वहाँ इच्छानुसार साधन करनेवालोंको स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्त होते हैं। भारतमें महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र—ये सात कुलपर्वत हैं। यहाँ सकाम साधनसे स्वर्ग प्राप्त होता है, निष्काम साधनसे मोक्ष मिलता है तथा यहाँके लोग पाप करनेपर तिर्यग्योनि और नरकोंमें भी पड़ते हैं। भारतके सिवा अन्यत्र मनुष्योंके लिये कर्मभूमि नहीं है। इस भारतवर्षके नौ भेद हैं—इन्द्रद्वीप, कसेतुमान्, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्यद्वीप, गन्धर्वद्वीप, वारुणद्वीप तथा समुद्रसे घिरा हुआ यह नवाँ द्वीप भारत। यह नवम द्वीप दक्षिणसे उत्तरतक एक हजार योजन लंबा है। इसके अंदर पूर्व-दिशामें किरात तथा पश्चिम-दिशामें यवन रहते हैं; मध्यमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जातिके लोग रहते हैं, जिनकी क्रमशः—यज्ञ, युद्ध, वाणिज्य तथा सेवा—ये चार वृत्तियाँ हैं। शतद्रू (सतलज) और चन्द्रभागा (चनाब) आदि नदियाँ हिमालयकी शाखाओंसे निकली हैं। वेदस्मृति आदि सरिताओंका उद्गम पारियात्र-पर्वत है। नर्मदा और सुरमा आदि नदियाँ विन्ध्यपर्वतसे प्रकट हुई हैं। तापी, पयोष्णी, निर्विन्ध्या तथा कावेरी आदि सरिताएँ ऋक्षकी शाखासे निकली हैं। इनका नाम श्रवण करनेमात्रसे ये सब पापोंको हर लेती हैं। गोदावरी, भीमरथी तथा कृष्णवेणी आदि पापनाशिनी नदियाँ सह्यपर्वतकी संतानें हैं। कृतमाला, ताम्रपर्णी आदिका उद्गमस्थान मलयपर्वत है। त्रिसंध्य, ऋषिकुल्या आदि नदियाँ महेन्द्रपर्वतसे प्रकट हुई हैं। ऋषिकुल्या और कुमारा आदि नदियाँ शुक्तिमान्‌के शाखापर्वतोंसे निकली हैं। इन नदियोंकी शाखाभूत सहस्रों उपनदियाँ भी हैं। इनके मध्यमें कुरु, पाञ्चाल, मध्यप्रदेश, पूर्वदेश, कामरूप (आसाम), पौण्ड्र, कलिङ्ग (उड़ीसा), मगध, दक्षिणके प्रदेश, अपरान्त, सौराष्ट्र (काठियावाड़), शूद्र, आभीर, अर्बुद (आबू), मरु (मारवाड़), मालवा, पारियात्र, सौवीर, सिंधु, शाल्व, शाकल्य, मद्र, अम्बष्ठ तथा पारसीक आदि प्रदेश और वहाँके निवासी रहते हैं। वे उपर्युक्त नदियोंके जल पीते तथा समभावसे रहते हैं। उक्त