संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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वे बिलसे निकले और विनीत सेवकोंके साथ द्वारकामें गये। वहाँ सब यादवोंसे भरी हुई सभामें श्रीकृष्णने वह मणि सत्राजित्को दे दी। इस प्रकार
मिथ्या कलङ्क लगनेपर भगवान् श्रीकृष्णने स्यमन्तकमणिको ढूँढ़ निकाला और उसे देकर अपने ऊपर आये हुए कलङ्कका मार्जन किया। सत्राजित्के दस पत्नियाँ थीं। उनके गर्भसे उन्हें सौ पुत्र प्राप्त हुए, जिनमें तीन अधिक प्रसिद्ध थे—भंगकार, वातपति और वसुमेध। सत्राजित्के तीन कन्याएँ भी थीं, जो सब दिशाओंमें विख्यात थीं—सत्यभामा, व्रतिनी तथा प्रस्वापिनी। इनमें सत्यभामा सबसे उत्तम थीं। उसका विवाह पिताने श्रीकृष्णके साथ कर दिया। जो भगवान् श्रीकृष्णके इस मिथ्या कलङ्कका श्रवण करता है, उसे मिथ्या कलङ्क कभी स्पर्श नहीं करते।
श्रीकृष्णने सत्राजित्को जो स्यमन्तकमणि दी थी, उसका अक्रूरने भोजवंशी शतधन्वाके द्वारा अपहरण करा दिया। महाबली शतधन्वा सत्राजित्को मारकर वह मणि ले आया तथा अक्रूरको दे दी।
अक्रूरने उस उत्तम रत्नको लेते हुए शतधन्वासे प्रतिज्ञा करा ली कि 'मेरा नाम न बताना।'
पिताके मारे जानेपर मनस्विनी सत्यभामा दुःखसे आतुर हो उठी और रथपर आरूढ़ हो वारणावत नगरमें गयी। वहाँ अपने स्वामी श्रीकृष्णको शतधन्वाकी सारी करतूतें बतलाकर उनके पास खड़ी हो आँसू बहाने लगी। तब भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही द्वारका आ पहुँचे और अपने बड़े भाई बलरामजीसे बोले—'प्रभो! प्रसेनको तो सिंहने मार डाला और सत्राजित्को शतधन्वाने। अब स्यमन्तकमणि मेरे अधिकारमें आनेवाली है। अब मैं ही उसका उत्तराधिकारी हूँ; इसलिये शीघ्र ही रथपर बैठिये और महारथी शतधन्वाको मारकर मणि छीन लीजिये। महाबाहो! अब स्यमन्तक हमलोगोंका ही होगा।' तदनन्तर शतधन्वा और श्रीकृष्णमें घोर युद्ध हुआ। शतधन्वा सब ओर अक्रूरके आनेकी बाट देखने लगा। वह और भगवान् श्रीकृष्ण दोनों ही एक-दूसरेपर कुपित हो रहे थे। जब अक्रूरने साथ नहीं दिया, तब शतधन्वाने भयभीत हो भाग जानेका विचार किया। उसके पास हृदया नामकी एक घोड़ी थी, जो सौ योजन चलती थी। वह उसीपर आरूढ़ हो श्रीकृष्णसे युद्ध कर रहा था। सौ योजनका मार्ग वेगसे तै करनेके कारण वह घोड़ी थककर शिथिल हो गयी। यह देख भगवान् श्रीकृष्णने बलरामजीसे कहा—'महाबाहो! आप यहीं खड़े रहें। मैंने उस घोड़ीकी कमजोरी देख ली है। अब तो मैं पैदल ही जाकर मणिरत्न स्यमन्तकको छीन लाऊँगा' यह कहकर भगवान् पैदल ही शतधन्वाके पास गये और मिथिलाके समीप उन्होंने उसका वध कर डाला, परंतु उसके पास स्यमन्तक नहीं दिखायी दिया। महाबली शतधन्वाको मारकर जब श्रीकृष्ण लौटे, तब बलरामजीने कहा—'मणि