संक्षिप्त ब्रह्मपुराण
Brahma Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* क्रोष्टु आदिके वंशका वर्णन तथा स्यमन्तकमणिकी कथा * ४५
लोगोंको आश्चर्यमें डालकर वे अन्तःपुरमें पहुँचे। सत्राजित्ने वह उत्तम मणि अपने छोटे भाई प्रसेनजित्को दे दी, क्योंकि उसको वे बहुत प्यार करते थे। वह मणि अन्धकवंशी यादवोंके घरमें सुवर्ण उत्पन्न करती थी। वह जहाँ रहती, उसके निकटवर्ती जनपदोंमें मेघ समयपर वर्षा करता तथा किसीको रोगका भय नहीं रहता था। एक बार भगवान् श्रीकृष्णने प्रसेनके सम्मुख वह स्यमन्तक नामक मणिरत्न लेनेकी इच्छा प्रकट की; किन्तु उसे वे नहीं पा सके। समर्थ होनेपर भी भगवान्ने उसका बलपूर्वक अपहरण नहीं किया।
एक दिन प्रसेन उस मणिरत्नसे विभूषित हो वनमें शिकार खेलनेके लिये गये। वहाँ स्यमन्तकके लिये ही एक सिंहके हाथसे मारे गये। सिंह उस मणिको मुखमें दबाये भागा जा रहा था। इतनेमें ही महाबली ऋक्षराज जाम्बवान् उधर आ निकले। वे सिंहको मारकर मणिरत्न ले अपनी गुफामें चले गये। इधर वृष्णि और अन्धक-वंशके लोग यह संदेह करने लगे कि हो-न-हो श्रीकृष्णने ही मणिके लिये प्रसेनका वध किया है; क्योंकि उन्होंने एक बार वह मणि प्रसेनसे माँगी थी। भगवान् श्रीकृष्णने यह कार्य नहीं किया था तो भी उनपर संदेह किया गया; अतः अपने कलंकका मार्जन करनेके लिये वे मणिको ढूँढ़ लानेकी प्रतिज्ञा करके वनमें गये। कुछ विश्वसनीय पुरुषोंके साथ प्रसेनके चरण-चिह्नोंका पता लगाते हुए वे उस स्थानपर गये, जहाँ प्रसेन शिकार खेल रहे थे। गिरिवर ऋक्षवान् तथा उत्तम पर्वत विन्ध्यपर उनका अन्वेषण करते हुए वे लोग थक गये। अन्तमें श्रीकृष्णने एक स्थानपर घोड़ेसहित मरे हुए प्रसेनकी लाश देखी, किन्तु वहाँ मणि नहीं मिली। तदनन्तर थोड़ी ही दूरपर ऋक्षके द्वारा मारे गये सिंहका शरीर दिखायी पड़ा। ऋक्ष अपने चरण-चिह्नोंसे पहचाना गया। उन्हीं चिह्नोंके द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण जाम्बवान्की गुफाके द्वारपर पहुँचे। वहाँ उन्हें बिलके भीतरसे किसी धायकी कही हुई यह वाणी सुनायी दी—'मेरे सुकुमार बच्चे! तू मत रो। सिंहने प्रसेनको मारा और सिंह जाम्बवान्के हाथसे मारा गया। अब यह स्यमन्तकमणि तेरी ही है।'
यह आवाज सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उस गुफाके द्वारपर बलरामजीके साथ अन्य यादवोंको बिठा दिया और स्वयं उन्होंने गुफाके भीतर प्रवेश किया। बिलके भीतर जाम्बवान् दिखायी दिये। भगवान् वासुदेवने लगातार इक्कीस दिनोंतक उनके साथ बाहुयुद्ध किया। इसी बीचमें बलदेव आदि यादव द्वारका लौट गये और सबको श्रीकृष्णके मारे जानेकी सूचना दे दी। इधर भगवान् वासुदेवने महाबली जाम्बवान्को परास्त करके उनकी कन्या जाम्बवतीको उन्हींके अनुरोधसे ग्रहण किया। साथ ही अपनी सफाई देनेके लिये वह स्यमन्तकमणि भी ले ली। तत्पश्चात् ऋक्षराजकी अभ्यर्थना करके