भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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* क्रोष्टु आदिके वंशका वर्णन तथा स्यमन्तकमणिकी कथा * ४३

पुत्र जीमूत बतलाये जाते हैं। जीमूतके विकृति, विकृतिके भीमर्थ, भीमर्थके नवरथ और नवरथके पुत्र दशरथ हुए। दशरथके पुत्रका नाम शकुनि था। शकुनिसे करम्भ तथा करम्भसे देवरातका जन्म हुआ। देवरातके पुत्र देवक्षत्र तथा देवक्षत्रके महायशस्वी वृद्धक्षत्र हुए। वे देवकुमारके समान कान्तिमान् थे। इनके सिवा मधुरभाषी राजा मधुका भी जन्म हुआ, जो मधुवंशके प्रवर्तक थे। मधुके उनकी पत्नी वैदर्भीसे नरश्रेष्ठ पुरुद्वान्की उत्पत्ति हुई। मधुकी दूसरी पत्नी इक्ष्वाकुवंशकी कन्या थी। उससे सर्वगुणसम्पन्न सत्त्वान् हुए, जो सात्त्वत कुलकी कीर्तिको बढ़ानेवाले थे।

सत्त्वान्से सत्त्वगुणसम्पन्ना कौसल्याने भजमान, देवावृध, अन्धक तथा वृष्णि नामक पुत्र उत्पन्न किये। इनके चार कुल यहाँ विस्तारपूर्वक बतलाये गये हैं। भजमानके दो स्त्रियाँ थीं। एकका नाम था बाह्यकसृञ्जयी और दूसरीका उपबाह्यकसृञ्जयी। उन दोनोंके गर्भसे बहुत-से पुत्र हुए। क्रिमि, क्रमण, धृष्ट, शूर तथा पुरञ्जय—ये भजमानके बाह्यकसृञ्जयीसे उत्पन्न हुए पुत्र थे। अयुताजित्, सहस्राजित्, शताजित् और दासक—ये भजमानद्वारा उपबाह्यकसृञ्जयीके गर्भसे उत्पन्न हुए पुत्र थे। राजा देवावृध यज्ञपरायण रहते थे। उन्होंने सर्वगुणसम्पन्न पुत्र होनेके उद्देश्यसे भारी तपस्या की। तपस्यामें संलग्न होकर वे पर्णाशाके जलका आचमन करते थे। सदा ऐसा ही करनेके कारण उस नदीने उनका प्रिय करना चाहा। कल्याणमय नरेश देवावृधके अभीष्टकी सिद्धि कैसे हो—इस चिन्तामें देरतक पड़ी रहनेपर भी पर्णाशा सहसा किसी निश्चयपर न पहुँच सकी। उसे ऐसी कोई स्त्री नहीं मिली, जिसके गर्भसे वैसा सुयोग्य पुत्र उत्पन्न हो सके। तब उसने यह निश्चय किया कि मैं स्वयं ही चलकर इनकी सहधर्मिणी बनूँगी। यह विचारकर पर्णाशाने एक परम सुन्दरी कुमारीका रूप धारण करके राजाको पतिरूपमें वरण किया। राजाने भी उसकी कामना की। तदनन्तर उन उदारबुद्धि नरेशने उसमें एक तेजस्वी गर्भकी स्थापना की। तत्पश्चात् दसवें महीनेमें पर्णाशाने देवावृधके सर्वगुणसम्पन्न पुत्र बभ्रुको जन्म दिया। इस वंशके विषयमें पुराणोंके ज्ञाता देवावृधके गुणोंका बखान करते हुए निम्नाङ्कित प्रसिद्ध गाथाका गान करते हैं। 'हम जैसे आगे देखते हैं, वैसे ही दूर और निकट भी देखते हैं। हमारी दृष्टिमें बभ्रु सब मनुष्योंमें श्रेष्ठ हैं और देवावृध तो देवताओंके तुल्य हैं। बभ्रु और देवावृधके सम्पर्कमें आकर एक हजार चौहत्तर मनुष्य अमृतत्वको प्राप्त हो चुके हैं।'

बभ्रुका वंश बहुत बड़ा था। उसमें सब-के-सब यज्ञपरायण, महादानी, बुद्धिमान्, ब्राह्मणभक्त तथा सुदृढ़ आयुध धारण करनेवाले थे। मृत्तिकावतीपुरीमें भोजवंशके क्षत्रिय रहते थे। अन्धकसे काश्यकी कन्याने चार पुत्र प्राप्त किये—कुकुर, भजमान, शशक और बलबर्हिष्। कुकुरके पुत्र वृष्टि, वृष्टिके कपोतोरोमा, कपोतोरोमाके तित्तिरि, उसके पुनर्वसु, पुनर्वसुके अभिजित् तथा अभिजित्के आहुक एवं श्राहुक नाम दो जुड़वाँ पुत्र हुए। इनके विषयमें ऐसी गाथा प्रसिद्ध है—'आहुक किशोरावस्थाके समान आकृतिवाले थे। वे अस्सी कवच धारण किये हुए अपने श्वेतवर्णवाले परिवारके साथ पहले यात्रा करते थे। जो भोजवंशी आहुकके दोनों ओर चलते थे, उनमेंसे कोई ऐसा नहीं था, जो पुत्रवान् न हो, सौसे कम दान करता हो, हजार या सौसे कम आयुवाला हो, अशुद्ध कर्म करता हो अथवा यज्ञ न करता हो। भोजवंशी आहुककी पूर्व दिशामें इक्कीस हजार हाथी चलते थे, जिनपर सोने-चाँदीके हौदे कसे होते थे। उत्तर दिशामें भी उनकी उतनी ही संख्या होती थी। भोजवंशी प्रत्येक भूपालकी भुजामें धनुषकी प्रत्यञ्चाके चिह्न होते थे।