भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

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पृष्ठ 210

२०८ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

पदभ्रष्ट होना पड़ा। इन्द्र उन बातोंको याद करके चिन्ताजनित संतापसे उदास रहा करते थे। तदनन्तर एक दिन उन्होंने बृहस्पतिजीसे पूछा—'वागीश्वर! क्या कारण है कि बीच-बीचमें मुझे अपने राज्यसे भ्रष्ट होना पड़ता है? इस प्रकार पदभ्रष्ट होनेकी अपेक्षा तो निर्धन हो जाना ही अच्छा है। कर्मोंकी गहन गतिको कौन ठीक-ठीक जानता है। सब पदार्थोंके रहस्यको जाननेमें आपके सिवा और कोई समर्थ नहीं है।'

तब बृहस्पतिजीने इन्द्रसे कहा—'चलकर ब्रह्माजीसे पूछो। वे ही भूत, भविष्य और वर्तमानकी बातें जानते हैं। महामते! जिस कारणसे ऐसा होता है, वह सब वे बता देंगे।' ऐसा निश्चय करके वे दोनों मेरे पास आये और मुझे नमस्कार करके हाथ जोड़कर बोले—'भगवन्! किस दोषसे शचीपति इन्द्र अपने राज्यसे भ्रष्ट होते हैं? नाथ! इस संदेहका निवारण कीजिये।'

उनका यह प्रश्न सुनकर मैंने बहुत देरतक विचार किया। तत्पश्चात् बृहस्पतिसे कहा—'ब्रह्मन्! खण्डधर्म नामक दोषके कारण इन्द्रको राज्यपदसे च्युत होना पड़ता है। देश-काल आदिके दोषसे, श्रद्धा और मन्त्रका अभाव होनेसे, यथावत् दक्षिणा न देनेसे, असत् वस्तुका दान करनेसे और विशेषतः देवता तथा ब्राह्मणोंकी अवहेलनाके पातकसे जो देहधारियोंका अपना धर्म खण्डित हो जाता है, उससे अत्यधिक मानसिक संतापका सामना करना पड़ता है तथा पदकी हानि भी अनिवार्य हो जाती है। क्षोभपूर्ण चित्तसे किया हुआ धर्म भी अनिष्टका ही कारण होता है। उससे कार्यकी सिद्धि नहीं होती। अपना धर्म पूर्ण न होनेपर कौन-सा अनिष्ट नहीं होता।' यों कहकर मैंने उनके पूर्वजन्मका वृत्तान्त भी बतलाया। 'पूर्वजन्ममें इन्द्र राजा आयुके पुत्र धन्वन्तरि थे। उनकी तपस्यामें तम नामक राक्षसने विघ्न डाल दिया, फिर भगवान् विष्णुने उस विघ्नका निवारण किया। इस तरह इनके पूर्वजन्मोंमें ऐसे वृत्तान्त अनेक हो सकते हैं। उन्हींके फलसे इन्हें कभी-कभी अपने राज्यसे वञ्चित रहना पड़ता है।'

मेरी बात सुनकर इन्द्र और बृहस्पति दोनोंको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने फिर मुझसे ही पूछा—'सुरश्रेष्ठ! खण्डधर्मत्व दोषका निवारण कैसे होगा?' तब मैंने पुनः सोचकर कहा—'सुनो; एक उपाय बताता हूँ, जो समस्त दोषोंका हारक, समस्त सिद्धियोंका कारक और दुःखमय संसार-सागरसे समस्त प्राणियोंका तारक है। जिनके चित्तमें संताप रहता है, उनको इसी उपायकी शरण लेनी चाहिये। यह समस्त जीवोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है। वह उपाय है—गौतमी देवीके तटपर जाकर भगवान् विष्णु और शिवकी स्तुति करना।' यह सुनकर वे उसी समय गौतमीके तटपर गये और स्नान करके बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् विष्णु और शिवकी स्तुति करने लगे। इन्द्रने श्रीविष्णुकी स्तुति की और बृहस्पतीने श्रीशिवकी।

इन्द्र बोले—मत्स्य, कूर्म और वाराहरूप धारण करनेवाले भगवान् विष्णुको बारंबार नमस्कार है। नरसिंहदेव तथा वामनको भी नमस्कार है। हयग्रीवरूपधारी भगवान्‌को नमस्कार है। त्रिविक्रम! आपको नमस्कार है। श्रीराम, बुद्ध और कल्किरूप भगवान्‌को नमस्कार है। परमेश्वर! आप अनन्त एवं अच्युत हैं। आपको नमस्कार है। परशुरामरूपधारी! आपको नमस्कार है। मैं इन्द्र, वरुण और यम आपके ही स्वरूप हैं। आपको नमस्कार है। त्रिलोकीरूपधारी देवता परमेश्वरको नमस्कार है। भगवन्! आप अपने मुखमें सरस्वतीको धारण करते हैं और सर्वज्ञ हैं। आप लक्ष्मीवान्