भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished434 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 434 में से

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पृष्ठ 209
  • पूर्णतीर्थ और गोविन्द आदि तीर्थोंकी महिमा * २०७

हैं। ईश! आपकी जय हो। आप सदसत्स्वरूप हैं। माधव! आपकी जय हो। आप धर्मनिष्ठ परमात्माको नमस्कार है। कामनाओंको पूर्ण करनेवाले और कामस्वरूप केशव! आपकी जय हो। गुणोंके सागर श्रीराम! आपकी जय हो। आप पुष्टि देनेवाले और पुष्टिके स्वामी हैं। आपकी जय हो, जय हो। कल्याणदाता! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण भूतोंके पालक! आपकी जय हो। भूतेश्वर ! आपकी जय हो। आप मौन धारण करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है। कर्मफलोंके दाता! आपकी जय हो। आप ही कर्मस्वरूप हैं। पीताम्बरधारी प्रभो! आपकी जय हो। सर्वेश्वर! आपकी जय हो। आप सर्वस्वरूप हैं। आप मङ्गलस्वरूप प्रभुको नमस्कार है। नाथ! आप सत्त्वगुणके अधिनायक हैं। आपकी जय हो, जय हो। आप सम्पूर्ण वेदोंके ज्ञाता हैं। आपको मेरा नमस्कार है। आप ही जन्मदाता हैं और आप ही जन्म लेनेवाले प्राणियोंके भीतर निवास करते हैं। आपकी जय हो। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। मुक्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही मुक्ति हैं। भोग प्रदान करनेवाले केशव! आपकी जय हो। लोकप्रद परमेश्वर! आपकी जय हो। पापोंका नाश करनेवाले लोकेश्वर! आपकी जय हो। भक्तवत्सल! आपकी जय हो, जय हो। चक्र धारण करनेवाले आप परमेश्वरको प्रणाम है। मानदाता! आपकी जय हो। आप ही मान हैं। विश्ववन्दित देव! आपकी जय हो। धर्मदाता! आपकी जय हो। आप धर्मस्वरूप हैं। संसारसे पार लगानेवाले परमात्मन्! आपकी जय हो। अन्नदाता! आपकी जय हो, जय हो। आप ही अन्न हैं। वाचस्पते! आपको नमस्कार है। शक्तिदाता! आपकी जय हो, आप ही शक्ति हैं। विजयका वरदान देनेवाले ईश्वर! आपकी जय

हो। यज्ञदाता! आपकी जय हो। आप ही यज्ञ हैं। आपके नेत्र पद्मपत्रकी तरह विशाल हैं। आपकी जय हो। दान देनेवाले परमेश्वर! आपकी जय हो। आप ही दान हैं। कैटभका नाश करनेवाले नारायण! आपकी जय हो। कीर्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही कीर्ति हैं। मूर्तिदाता! आपकी जय हो। आप ही मूर्ति धारण करनेवाले हैं। सौख्यदाता! आपकी जय हो। आप ही सौख्यस्वरूप हैं। पावनको भी पावन बनानेवाले परमात्मन् ! आपकी जय हो। शान्तिदाता! आपकी जय हो! आप ही शान्ति हैं। भगवान् शंकरकी भी उत्पत्तिके कारण! आपकी जय हो। ज्योतिःस्वरूप! आपकी जय हो। वामन! आपकी जय हो। वित्तेश! आपकी जय हो। धूममयी पताकावाले! आपकी जय हो। सम्पूर्ण जगत्के लिये दातारूप परमेश्वर! आपको नमस्कार है। पुण्डरीकाक्ष! आप ही त्रिलोकीमें रहनेवाले जीवसमुदायका क्लेश निवारण करनेमें दक्ष हैं। कृपानिधे! विष्णो! आप मेरे मस्तकपर अपना वरद हाथ रखिये।

समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले शङ्ख-चक्र-गदाधर भगवान् विष्णुने इस प्रकार स्तुति करनेवाले धन्वन्तरिसे वर माँगनेको कहा। तब राजाने विनीत होकर कहा—'मैं देवताओंका राजा होना चाहता हूँ।' 'तथास्तु' कहकर भगवान् वहाँसे अन्तर्धान हो गये और राजा धन्वन्तरिने क्रमशः उन्नति करते हुए देवेन्द्रपद प्राप्त किया। पूर्वजन्ममें किये हुए अनेक कर्मोंके परिणामस्वरूप इन्द्रको तीन बार अपने पदसे भ्रष्ट होना पड़ा। वृत्रासुरका वध होनेपर नहुषके द्वारा इन्द्रका पद छीना गया। इसके बाद इन्द्रने सिन्धुसेनकी हत्या कर डाली। अतः उस पापसे भी उनके पदकी हानि हुई। तीसरी बार अहल्याके साथ समागम करनेके कारण तथा अन्य कारणोंसे भी उन्हें

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