भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

संक्षिप्त ब्रह्मपुराण

Brahma Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२०२ * संक्षिप्त ब्रह्मपुराण *

विन्ध्यगिरिकी प्रशंसा की और देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये इस प्रकार कहा—'पर्वतश्रेष्ठ! मैं तत्त्वदर्शी मुनियोंके साथ तीर्थयात्राके उद्देश्यसे दक्षिण दिशाकी यात्रा करना चाहता हूँ, तुम मुझे जानेका मार्ग दो। मैं तुमसे आतिथ्यमें यही माँगता हूँ—जबतक लौट न आऊँ, तबतक तुम नीचे होकर ही रहना। इसके विपरीत न करना।' विन्ध्यपर्वतने कहा—'बहुत अच्छा। ऐसा ही करूँगा।' महर्षि अगस्त्य उन मुनियोंके साथ दक्षिण दिशामें चले गये। वे धीरे-धीरे गौतमीके तटपर पहुँचकर सांवत्सरिक यज्ञमें दीक्षित हो गये। उन्होंने ऋषियोंके साथ एक वर्षतकके लिये यज्ञ आरम्भ कर दिया।

उन दिनों कैटभके दो पापी पुत्र राक्षस धर्मके कण्टक हो रहे थे। उनका नाम था—अश्वत्थ और पिप्पल। वे देवलोकमें भी प्रसिद्ध थे। ब्राह्मणोंको पीड़ा देना उनका नित्यका काम था। ब्राह्मणोंका कष्ट देख महर्षिगण गोदावरीके दक्षिणतटपर नियमपूर्वक तपस्या करनेवाले सूर्यपुत्र शनैश्चरके पास गये और उनसे उन राक्षसोंके सब अत्याचार कह सुनाये। यह सुनकर शनैश्चर ब्राह्मणके वेशमें रहनेवाले अश्वत्थ नामक राक्षसके पास गये और स्वयं भी ब्राह्मण बनकर उन्होंने उसकी परिक्रमा की। उन्हें परिक्रमा करते देख राक्षसने ब्राह्मण ही समझा और प्रतिदिनकी भाँति माया करके उस पापी राक्षसने उनको भी अपना ग्रास बना लिया। उसके शरीरमें प्रवेश करके शनिने उसकी आँतोंको देखा। शनिकी दृष्टि पड़ते ही वह पापात्मा राक्षस वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति क्षणभरमें जलकर भस्म हो गया। अश्वत्थको भस्म करके वे ब्राह्मणरूपधारी शनि दूसरे राक्षसके पास गये। वहाँ उन्होंने अपनेको वेदाध्ययन करनेवाले ब्राह्मणके रूपमें उपस्थित किया, मानो वे विनीत शिष्य थे और पिप्पल गुरु। पिप्पलने पहलेकी ही भाँति अन्य शिष्योंके समान शनैश्चरको भी अपना आहार बनाया, किंतु उदरमें प्रवेश करनेपर शनिने उसकी आँतोंपर दृष्टि डाली। उनके देखते ही वह भी जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार उन दोनोंको मारकर सूर्यपुत्र शनैश्चरने मुनियोंसे पूछा— 'अब मेरे लिये कौन-सा कार्य है? आपलोग बतायें।' मुनियोंको बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने शनिको इच्छानुसार वर देना चाहा। शनैश्चर बोले—'जो मेरे दिनको नियमसे रहकर अश्वत्थका स्पर्श करें, उनके सब कार्य सिद्ध हो जायें और मेरे द्वारा होनेवाली पीड़ा भी उन्हें न हो। जो मनुष्य अश्वत्थतीर्थमें स्नान करें, उनके भी सब कार्य सिद्ध हो जायें। जो मानव शनिवारको प्रातःकाल उठकर अश्वत्थका स्पर्श करते हैं, उनकी समस्त ग्रहपीड़ा दूर हो जाय।' तबसे उस तीर्थको अश्वत्थतीर्थ, पिप्पलतीर्थ और शनैश्चरतीर्थ भी कहते हैं। अगस्त्य, सात्रिक, याज्ञिक और सामग आदि सोलह हजार एक सौ आठ तीर्थ वहाँ वास करते हैं। उन तीर्थोंमें किया हुआ स्नान और दान सम्पूर्ण यज्ञोंका फल देनेवाला है।

इसके आगे विख्यात सोमतीर्थ है। उसमें स्नान और दान करनेसे सोमपानका फल मिलता है। ओषधियाँ पूर्वकालसे ही सम्पूर्ण जगत्की माताएँ हैं। उन्हींमें यज्ञ, स्वाध्याय और धर्मकार्य प्रतिष्ठित है। ओषधियोंसे ही समस्त रोगोंका निवारण होता है। उन्हींसे अन्नकी उत्पत्ति और सबके प्राणोंकी रक्षा होती है। एक दिन ओषधियोंने मुझसे कहा—'सुरश्रेष्ठ ! हमलोगोंको एक ऐसा पति दीजिये, जो राजा हो।' उनकी बात सुनकर मैंने कहा—'तुम सबको राजा पतिरूपमें प्राप्त होगा।' तब उन्होंने पुनः प्रश्न किया— 'इसके लिये हमें कहाँ जाना होगा?' मैंने कहा—