वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगया है। ऐसी दशामें 'अजा' शब्द भी सांख्यसम्मत मूल प्रकृतिका ही वाचक क्यों न माना जाय?' इस शंकाका निराकरण करनेके लिये कहते हैं— न संख्योपसंग्रहादपि नानाभावादतिरेकाच्च ॥ १। ४। ११॥ संख्योपसंग्रहात् =(श्रुतिमें) संख्याका ग्रहण होनेसे; अपि=भी; न=वह (सांख्यमतोक्त तत्त्वोंकी) गणना नहीं है; नानाभावात्=क्योंकि वह संख्या दूसरे-दूसरे अनेक भाव व्यक्त करनेवाली है; च=तथा; अतिरेकात्=(वहाँ) उससे अधिकका भी वर्णन है। व्याख्या-बृहदारण्यकोपनिषद्में कहा गया है कि— यस्मिन् पञ्च पञ्चजना आकाशश्च प्रतिष्ठितः। तमेव मन्य आत्मानं विद्वान् ब्रह्मामृतोऽमृतम् ॥ (४। ४। १७) 'जिसमें पाँच पंचजन और आकाश भी प्रतिष्ठित है, उसी आत्माको मृत्युसे रहित मैं विद्वान् अमृतस्वरूप ब्रह्म मानता हूँ।'-इस मन्त्रमें जो संख्यावाचक 'पंच-पंच' शब्द आये हैं, इनको लेकर पचीस तत्त्वोंकी कल्पना करना उचित नहीं है; क्योंकि यहाँ ये संख्यावाचक शब्द दूसरे- दूसरे भावको व्यक्त करनेवाले हैं। इसके सिवा, 'पंच-पंच' से पचीस संख्या माननेपर भी उक्त मन्त्रमें वर्णित आकाश और आत्माको लेकर सत्ताईस तत्त्व होते हैं; जो सांख्यमतकी निश्चित गणनासे अधिक हो जाते हैं। अतः यही मानना ठीक है कि वेदमें न तो सांख्यसम्मत स्वतन्त्र 'प्रधान' का वर्णन है और न पचीस तत्त्वोंका ही। जिस प्रकार श्वेताश्वतरोपनिषद्में 'अजा' शब्दसे उस परब्रह्म परमेश्वरकी अनादि शक्तिका वर्णन किया गया है, उसी प्रकार यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा परमेश्वरकी विभिन्न कार्य-शक्तियोंका वर्णन है। सम्बन्ध—तब फिर यहाँ 'पञ्च पञ्चजनाः' पदोंके द्वारा किनका ग्रहण होता है? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं—