भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 123, कुल 486 में से

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पृष्ठ 123

१२० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ आगे चलकर स्पष्ट कर दिया है कि भोक्ता (अक्षरतत्त्व), भोग्य (क्षरतत्त्व) और उन दोनोंका प्रेरक ईश्वर—इन तीनों रूपोंमें ब्रह्म ही बताया गया है।* अतः ‘अजा’ शब्दका पर्याय ‘प्रधान’ होनेपर भी वह सांख्यशास्त्रोक्त ‘प्रधान’ नहीं है। अपितु परमेश्वरके अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति है। सम्बन्ध—‘‘अनादि ईश्वर-शक्तिको यहाँ ‘अजा’ कहा गया है; यह बात कैसे मानी जा सकती है; क्योंकि वह तो रूप आदिसे रहित है और यहाँ अजाके लाल, सफेद और काला—ये तीन रंगके रूप बताये गये हैं?’’ ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— कल्पनोपदेशाच्च मध्वादिवदविरोधः ॥ १। ४। १० ॥ कल्पनोपदेशात् = जहाँ ‘अजा’ का रूपक मानकर उसके त्रिविध रूपकी कल्पनापूर्वक उपदेश किया गया है, इसलिये; च = भी; मध्वादिवत् = मधु आदिकी भाँति; अविरोधः = कोई विरोध नहीं है। व्याख्या—जैसे छान्दोग्य० (३।१)-में रूपककी कल्पना करते हुए, जो वास्तवमें मधु नहीं, उस सूर्यको मधु कहा गया है। बृहदारण्यकमें वाणीको; धेनु न होनेपर भी धेनु कहा गया है (बृह० उ० ९। ८। १), तथा द्युलोक आदिको अग्नि बताया गया है (बृह० उ० ६। २। ९)। इसी प्रकार यहाँ भी रूपककी कल्पनामें भगवान्‌की शक्तिभूता प्रकृतिको ‘अजा’ नाम देकर उसके लाल, सफेद और काले तीन रंग बताये गये हैं; इसलिये कोई विरोध नहीं है। जिज्ञासुको समझानेके लिये रूपककी कल्पना करके वर्णन करना उचित ही है। सम्बन्ध—‘‘पूर्व प्रकरणमें यह बात सिद्ध की गयी कि श्रुतिमें आया हुआ ‘अजा’ शब्द सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिका वाचक नहीं, परब्रह्म परमात्माकी स्वरूपभूता अनादि शक्तिका वाचक है। किंतु दूसरी श्रुतिमें ‘पंचपंच’ यह संख्यावाचक शब्द पाया जाता है। इससे यह धारणा होती है कि यहाँ सांख्योक्त पचीस तत्त्वोंका ही समर्थन किया

  • भोक्ता भोग्यं प्रेरितारं च मत्वा सर्वं प्रोक्तं त्रिविधं ब्रह्ममेतत्॥ (श्वेता० १। १२)