भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 122

सूत्र ९ ] अध्याय १ ११९ ज्योतिरुपक्रमा तु तथा ह्यधीयत एके॥ १। ४ । ९॥ तु=निश्चय ही; ज्योतिरुपक्रमा=यहाँ 'अजा' शब्द तेज आदि त्रिविध तत्त्वोंकी कारणभूता परमेश्वरकी शक्तिका वाचक है; हि=क्योंकि; एके=एक शाखावाले; तथा=ऐसा ही; अधीयते=अध्ययन (वर्णन) करते हैं। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद् (६। २। ३, ४)-में परमेश्वरसे उत्पन्न तेज आदि तत्त्वोंसे जगत्के विस्तारका वर्णन है। अतः यहाँ यही मानना ठीक है कि उनकी कारणभूता परमेश्वर-शक्तिको ही 'अजा' कहा गया है। छान्दोग्यमें बताया गया है कि 'उस परमेश्वरने विचार किया; 'मैं बहुत हो जाऊँ।' फिर उसने तेजको रचा, तत्पश्चात् तेजसे जल और जलसे अन्नकी उत्पत्ति कही गयी है। इसके बाद इनके तीन रूपोंका वर्णन है। अग्निमें जो लाल रंग है, वह तेजका है, जो सफेद रंग है, वह जलका है तथा जो काला रंग है, वह अन्न (पृथिवी)-का है।' इस प्रकार प्रत्येक वस्तुमें उक्त तेज आदि तीनों तत्त्वोंकी व्यापकताका वर्णन है (छा० उ० ६। ४। १ से ७ तक)। इसी तरह श्वेताश्वतरोपनिषद्में जो 'अजा' के तीन रंग बताये गये हैं, वे भी तेज आदिमें उपलब्ध होते हैं। अतः निश्चित रूपसे यह नहीं कहा जा सकता कि यहाँ अजाके नामसे प्रधानका ही वर्णन है। यदि प्रकृति या प्रधानका वर्णन मान लिया जाय तो भी यही मानना होगा कि वह उस परब्रह्मके अधीन रहनेवाली उसीकी अभिन्न शक्ति है, जो उक्त तेज आदि तीनों तत्त्वोंका भी कारण है। सांख्यशास्त्रोक्त प्रधानका वहाँ वर्णन नहीं है, क्योंकि श्वेताश्वतरोपनिषद् (१। १०)- में जहाँ उसका 'प्रधान' के नामसे वर्णन हुआ है, वहाँ भी उसको स्वतन्त्र नहीं माना है। अपितु क्षर-प्रधान अर्थात् भगवान्की शक्तिरूप अपरा प्रकृति, अक्षर-जीवात्मा अर्थात् भगवान्की परा प्रकृति-इन दोनोंको शासन करनेवाला उस परम पुरुष परमेश्वरको बताया है।* फिर

  • क्षरं प्रधानममृताक्षरं हरः क्षरात्मानावीशते देव एकः। (श्वेता० १।१०)