वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ नहीं होता; क्योंकि) अविशेषात् = किसी प्रकारकी विशेषताका उल्लेख न होनेसे; चमसवत् = 'चमस' की भाँति (उसे दूसरे अर्थमें भी लिया जा सकता है)। व्याख्या—श्वेताश्वतरोपनिषद् (१।९ तथा ४।५)-में जिस 'अजा'- का वर्णन है, उसका नाम चाहे जो रख लिया जाय, परंतु वास्तवमें वह परब्रह्मकी शक्ति है और उस ब्रह्मसे भिन्न नहीं है। उक्त उपनिषद्में यह स्पष्ट लिखा है कि 'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्। यः कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्तान्यधितिष्ठत्येकः ॥' 'जगत्का कारण कौन है?' इसपर विचार करनेवाले उन महर्षियोंने ध्यानयोगमें स्थित होकर उस परमदेव परमेश्वरकी स्वरूपभूता अपने गुणोंसे छिपी हुई अचिन्त्यशक्तिको ही कारणरूपमें देखा और यह निश्चय किया कि जो परमदेव अकेला ही काल, स्वभाव आदिसे लेकर आत्मातक समस्त तत्त्वोंका अधिष्ठान है, जिसके आश्रयसे ही वे सब अपने-अपने स्थानमें कारण बनते हैं, वही परमात्मा इस जगत्का कारण है (१।३)। अतः यह सिद्ध होता है कि वेदमें 'अजा' नामसे जिस प्रकृतिका वर्णन हुआ है, वह भगवान्के अधीन रहनेवाली उन्हींकी अभिन्न-स्वरूपा अचिन्त्य- शक्ति है, सांख्यकथित स्वतन्त्र तत्त्वरूप प्रधान या प्रकृति नहीं। इसी बातको स्पष्ट करनेके लिये सूत्रमें कहा गया है कि जिस प्रकार 'चमस' शब्द रूढ़िसे सोमपानके लिये निर्मित पात्रविशेषका वाचक होनेपर भी बृहदारण्यकोपनिषद् (२।२।३)-में आये हुए 'अर्वाग्बिलश्चमस ऊर्ध्वबुध्नः' इत्यादि मन्त्रमें वह 'शिर' के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है; उसी प्रकार यहाँ 'अजा' शब्द भगवान्की स्वरूपभूता अनादि-अचिन्त्य शक्तिके अर्थमें है, ऐसा माननेमें कोई बाधा नहीं है, क्योकि यहाँ ऐसा कोई विशेष कारण नहीं दीखता, जिससे 'अजा' शब्दके द्वारा सांख्यकथित स्वतन्त्र प्रकृतिको ही ग्रहण किया जाय। सम्बन्ध—'अजा' शब्द जिस अर्थमें रूढ़ है, उसको न लेकर यहाँ दूसरा कौन-सा अर्थ लिया गया है? इस जिज्ञासापर कहते हैं—