भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ११७ विषयमें न तो कोई प्रश्न है और न उत्तर ही। इससे यह निश्चित होता है कि यहाँ उक्त तीनोंके सिवा चौथेका प्रसंग ही नहीं है। सम्बन्ध— जब प्रधानका वाचक 'अव्यक्त' शब्द उस प्रकरणमें पड़ा है तो उसे दूसरे अर्थमें कैसे लगाया जा सकता है? इसपर कहते हैं— महद्वच्च ॥ १ । ४ । ७ ॥ महद्वत् = 'महत्' शब्दकी भाँति; च=ही इसको भी दूसरे अर्थमें लेना अयुक्त नहीं है। व्याख्या—जिस प्रकार 'महत्' शब्द सांख्यशास्त्रमें महत्तत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है, किंतु कठोपनिषद्में वही शब्द आत्माके अर्थमें प्रयुक्त है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्द भी दूसरे अर्थमें माना जाय तो कोई विरोध नहीं है। 'महत्' शब्दका प्रयोग जीवात्माके अर्थमें इस प्रकार आया है—'बुद्धेरात्मा महान् परः' (क० उ० १।३।१०) 'बुद्धिसे महान् आत्मा पर है।' यहाँ इसको बुद्धिसे परे बताया गया है, किंतु सांख्यमतमें बुद्धिका ही नाम महत्तत्त्व है। इसलिये यहाँ 'महत्' शब्द जीवात्माका वाचक है। इस प्रकार वेदोंमें जगह-जगह 'महत्' शब्दका प्रयोग सांख्यमतके विपरीत देखा जाता है, उसी प्रकार 'अव्यक्त' शब्दका अर्थ भी सांख्यमतसे भिन्न मानना अनुचित नहीं है, प्रत्युत उचित ही है। सम्बन्ध— 'इस प्रकरणमें आया हुआ 'अव्यक्त' शब्द यदि दूसरे अर्थमें मान लिया जाय तो भी श्वेताश्वतरोपनिषद्में 'अजा' शब्दसे अनादि प्रकृतिका वर्णन उपलब्ध होता है। वहाँ उसे श्वेत, लाल और काला—इन तीन वर्णोंवाली कहा गया है। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि सांख्यशास्त्रोक्त त्रिगुणात्मिका प्रकृतिको ही वेदमें जगत्का कारण माना गया है।' ऐसा संदेह उपस्थित होनेपर कहते हैं— चमसवदविशेषात् ॥ १ । ४ । ८ ॥ ('अजा' शब्द वहाँ सांख्यशास्त्रोक्त प्रकृतिका ही वाचक है, यह सिद्ध