वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें११६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ व्याख्या—कठोपनिषद्के प्रकरणमें नचिकेताने अग्नि, जीवात्मा और परमात्मा—इन्हीं तीनोंको जाननेके लिये प्रश्न किया है। अग्निविषयक प्रश्न इस प्रकार है—'स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वँ श्रद्दधानाय मह्यम्।' (क० उ० १। १। १३) अर्थात् 'हे यमराज! आप स्वर्गकी प्राप्तिके साधनरूप अग्निको जानते हैं; अतः मुझ श्रद्धालुके लिये वह अग्निविद्या भलीभाँति समझाकर कहिये।' तदनन्तर जीव-विषयक प्रश्न इस प्रकार किया गया है—'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहम्।' (क० उ० १। १। २०) अर्थात् "मरे हुए मनुष्यके विषयमें कोई तो कहता है, 'यह रहता है' और कोई कहता है 'नहीं रहता।' इस प्रकारकी यह शंका है, इसका निर्णय मैं आपके द्वारा उपदेश पाकर जानना चाहता हूँ।" तत्पश्चात् आगे चलकर परमात्माके विषयमें इस प्रकार प्रश्न उपस्थित किया गया है— अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात्। अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत् पश्यसि तद् वद॥ (क० उ० १। २। १४) 'जो धर्म और अधर्म दोनोंसे, कार्य-कारणरूप समस्त जगत्से एवं भूत, वर्तमान और भविष्यत्—इन तीन भेदोंवाले कालसे तथा तत्त्वसम्बन्धी समस्त पदार्थोंसे अलग है, ऐसे जिस तत्त्वको आप जानते हैं, उसीका मुझे उपदेश कीजिये।' —इस प्रकार इन तीनोंके विषयमें नचिकेताका प्रश्न है और प्रश्नके अनुसार ही यमराजका क्रमशः उत्तर भी है। अग्निविषयक प्रश्नका उत्तर क्रमशः १। १। १४ से १९ तकके मन्त्रोंमें दिया गया है। जीवविषयक प्रश्नका उत्तर पहले तो १। २। १८, १९ में, फिर २। २। ७ में दिया गया है। परमात्म- विषयक प्रश्नका उत्तर १। २। २० से लेकर ग्रन्थकी समाप्तितक दिया गया है। बीच-बीचमें कहीं जीवके स्वरूपका भी वर्णन हुआ है। परंतु 'प्रधान' के