वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ६ ] अध्याय १ ११५ ऐसा कहना ठीक नहीं है; हि=क्योंकि (वहाँ ज्ञेयतत्त्व); प्राज्ञः=परमात्मा ही है; प्रकरणात्=प्रकरणसे (यही बात सिद्ध होती है)। व्याख्या—कठोपनिषद्में जहाँ 'अव्यक्त' की चर्चा आयी है; उस प्रकरणके अन्त (१।३।१५)-में कहा गया है कि— अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथारसं नित्यमगन्धवच्च यत्। अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते॥ 'जो शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धसे रहित, अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त, महत्से परे तथा ध्रुव (निश्चल) है, उस तत्त्वको जानकर मनुष्य मृत्युके मुखसे छूट जाता है।' 'इस मन्त्रमें ज्ञेयतत्त्वके जो लक्षण बताये गये हैं, वे सब सांख्योक्त प्रधानमें भी संगत होते हैं; अतः यहाँ प्रधानको ही ज्ञेय बताना सिद्ध होता है।' ऐसी बात यदि कोई कहे तो उसका यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ परब्रह्म परमेश्वरके स्वरूपवर्णनका ही प्रकरण है; आगे-पीछे सब जगह उसीको जानने और प्राप्त करनेयोग्य बताया गया है। ऊपर जो मन्त्र उद्धृत किया गया है, उसमें बताये हुए सभी लक्षण परमात्मामें ही यथार्थरूपसे संगत होते हैं; अतः उसमें परमात्माके ही स्वरूपका वर्णन तथा उसे जाननेके फलका प्रतिपादन है, यह मानना पड़ेगा। इसलिये इस प्रकरणसे यही सिद्ध होता है कि श्रुतिमें परमात्माको ही जाननेके योग्य कहा गया है तथा उसीको जाननेका फल मृत्युके मुखसे छूटना बताया गया है। यहाँ प्रकृतिका वर्णन नहीं है। सम्बन्ध—कठोपनिषद्में अग्नि, जीवात्मा तथा परमात्मा—इन तीनका प्रकरण तो है ही; इसी प्रकार चौथे 'प्रधान' तत्त्वका भी प्रकरण मान लिया जाय तो क्या हानि है? इसपर कहते हैं— त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च॥ १।४।६॥ त्रयाणाम्=(इस उपनिषद्में) तीनका; एव=ही; एवम्=इस प्रकार ज्ञेय- रूपसे; उपन्यासः=उल्लेख हुआ है; च=तथा (इन्हीं तीनोंके सम्बन्धमें); प्रश्नः=प्रश्न; च=भी (किया गया) है।