वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें११४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ सकता है? फिर तो उसे सर्वशक्तिमान् भी कैसे माना जा सकता है? श्वेताश्वतरोपनिषद्में स्पष्ट कहा गया है कि 'महर्षियोंने ध्यानयोगमें स्थित होकर परमात्मदेवकी स्वरूपभूता अचिन्त्य शक्तिका साक्षात्कार किया जो अपने गुणोंसे आवृत है।'१ वहीं यह भी कहा गया है कि उस परमेश्वरकी स्वाभाविक ज्ञान, बल और क्रियारूप शक्तियाँ नाना प्रकारकी सुनी जाती हैं।२ सम्बन्ध — वेदमें बतायी हुई प्रकृति सांख्योक्त प्रधान नहीं है, इस बातको दृढ़ करनेके लिये दूसरा कारण बताते हैं— ज्ञेयत्वावचनाच्च ॥ १ । ४ । ४ ॥ ज्ञेयत्वावचनात् = वेदमें प्रकृतिको ज्ञेय नहीं बताया गया है, इसलिये; च = भी (यह सांख्योक्त प्रधान नहीं है)। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको ज्ञेय मानते हैं। उनका कहना है कि 'गुणपुरुषान्तरज्ञानात् कैवल्यम्' अर्थात् 'गुणमयी प्रकृति और पुरुषका पार्थक्य जान लेनेसे कैवल्य (मोक्ष) प्राप्त होता है।' प्रकृतिके स्वरूपको अच्छी तरह जाने बिना उससे पुरुषका पार्थक्य (भेद) कैसे ज्ञात होगा, अतः उनके मतमें प्रकृति भी ज्ञेय है। परंतु वेदमें प्रकृतिको ज्ञेय अथवा उपास्य कहीं नहीं कहा गया है। वहाँ तो एकमात्र परब्रह्म परमेश्वरको ही जाननेयोग्य तथा उपास्य बताया गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि वेदोक्त प्रकृति सांख्यवादियोंके माने हुए 'प्रधान' तत्त्वसे भिन्न है। सम्बन्ध — अपने मतकी पुष्टिके लिये सूत्रकार स्वयं ही शंका उठाकर उसका समाधान करते हैं— वदतीति चेन्न प्राज्ञो हि प्रकरणात् ॥ १ । ४ । ५ ॥ चेत् = यदि कहो; वदति = (वेद प्रकृतिको भी ज्ञेय) बताता है; इति न = तो १-'ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन् देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम्।' (श्वेता० १।३) २-यह मन्त्र पृष्ठ २४ की टिप्पणीमें आ गया है।