भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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पृष्ठ 116

सूत्र २-३ ] अध्याय १ ११३ सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ १ । ४ । २ ॥ तु = किंतु; सूक्ष्मम् = (इस प्रकरणमें ‘शरीर’ शब्दसे) सूक्ष्म शरीर गृहीत होता है; तदर्हत्वात् = क्योंकि परमधामकी यात्रामें रथके स्थानमें उसीको मानना उचित है। व्याख्या—परमात्माकी शक्तिरूप प्रकृति सूक्ष्म है, वह देखने और वर्णन करनेमें नहीं आती, उसीका अंश कारणशरीर है, अतः उसको अव्यक्त कहना उचित ही है। इसके सिवा परमधामकी यात्रामें रथके स्थानमें सूक्ष्म शरीर ही माना जा सकता है, क्योंकि स्थूल तो यहीं रह जाता है।* सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब प्रकृतिके अंशको ‘अव्यक्त’ नामसे स्वीकार कर लिया, तब सांख्यशास्त्रमें कहे हुए प्रधानको स्वीकार करनेमें क्या आपत्ति है ? सांख्यशास्त्र भी तो भूतोंके कारणरूप सूक्ष्म तत्त्वको ही ‘प्रधान’ या ‘प्रकृति’ कहता है। इसपर कहते हैं— तदधीनत्वादर्थवत् ॥ १ । ४ । ३ ॥ तदधीनत्वात् = उस परमात्माके अधीन होनेके कारण; अर्थवत् = वह (शक्तिरूपा प्रकृति) सार्थक है। व्याख्या—सांख्यमतावलम्बी प्रकृतिको स्वतन्त्र और जगत्का कारण मानते हैं; परंतु वेदका ऐसा मत नहीं है, वेदमें उस प्रकृतिको परब्रह्म परमेश्वरके ही अधीन रहनेवाली उसीकी एक शक्ति बताया गया है। शक्ति शक्तिमान्‌से भिन्न नहीं होती, अतः उसका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं माना जाता। इस प्रकार परमात्माके अधीन उसीकी एक शक्ति होनेके कारण उसकी सार्थकता है, क्योंकि शक्ति होनेसे ही शक्तिमान् परमेश्वरके द्वारा जगत्की सृष्टि आदि कार्योंका होना सम्भव है। यदि परब्रह्म परमेश्वरको शक्तिहीन मान लिया जाय, तब वह इस जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत्का कर्ता-धर्ता और संहर्ता कैसे हो

  • यह विषय सूत्र ४।२।५ से ४।२।११ तक विस्तारसे देखना चाहिये।