वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें१२४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ है—कहीं तो 'आत्मन् आकाशः सम्भूतः' (तै० उ० २। १) इत्यादि श्रुतिके द्वारा आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। कहीं 'तत्तेजोऽसृजत' (छा० उ० ६। २। ३) इत्यादि मन्त्रोंद्वारा तेज आदिके क्रमसे सृष्टिका प्रतिपादन किया गया है। कहीं 'स प्राणमसृजत' (प्र० उ० ६।४) इत्यादि वाक्योंद्वारा प्राण आदिके क्रमसे सृष्टिका वर्णन किया गया है। कहीं 'स इमाँल्लोकानसृजत। अम्भो मरीचीर्मरमापः' (ऐ० उ० १।१।२) इत्यादि वचनोंद्वारा बिना किसी सुव्यवस्थित क्रमके ही सृष्टिका वर्णन मिलता है। इस प्रकार सृष्टि-क्रमके वर्णनमें भेद होनेपर भी कोई दोषकी बात नहीं है, बल्कि इस प्रकार विचित्र रचनाका वर्णन तो ब्रह्मके महत्त्वका ही द्योतक है। कल्पभेदसे ऐसा होना सम्भव भी है। इसलिये ब्रह्मको ही जगत्का कारण बताना सर्वथा सुसंगत है। सम्बन्ध—"उपनिषदोंमें कहीं तो यह कहा है कि 'पहले एकमात्र असत् ही था' (तै० उ० २।७), कहीं कहा है 'पहले केवल सत् ही था' (छा० उ० ६।२।१), कहीं 'पहले अव्याकृत था' (बृह० उ० १।४।७) ऐसा वर्णन आता है। उपर्युक्त 'असत्' आदि शब्द ब्रह्मके वाचक कैसे हो सकते हैं?'' ऐसी शंका होनेपर कहते हैं— समाकर्षात् ॥ १। ४। १५॥ समाकर्षात्=आगे-पीछे कहे हुए वाक्यका पूर्णरूपसे आकर्षण करके उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेनेसे ('असत्' आदि शब्द भी ब्रह्मके ही वाचक सिद्ध होते हैं)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्में जो यह कहा है कि 'असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत।' (२।७) अर्थात् 'पहले यह असत् ही था। इसीसे सत् उत्पन्न हुआ।' यहाँ 'असत्' शब्द अभाव या मिथ्याका वाचक नहीं है; क्योंकि पहले अनुवाकमें ब्रह्मका लक्षण बताते हुए उसे सत्य, ज्ञान और अनन्त कहा गया है। फिर उसीसे आकाश आदिके क्रमसे समस्त जगत्की उत्पत्ति बतायी है। तदनन्तर छठे अनुवाकमें 'सोऽकामयत' के 'सः'