भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 486 में से

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पृष्ठ 383

३८० वेदान्त-दर्शन [ पाद ४ ऊर्ध्वरेतस्सु च शब्दे हि॥ ३। ४। १७॥ ऊर्ध्वरेतस्सु=जिनमें वीर्यको सुरक्षित रखनेका विधान है ऐसे तीन आश्रमोंमें; च=भी (ब्रह्मविद्याका अधिकार है;) हि=क्योंकि; शब्दे=वेदमें ऐसा कहा है (इसलिये ब्रह्मविद्या कर्मोंका अंग नहीं है)। व्याख्या—जैसे गृहस्थ-आश्रममें ब्रह्मविद्याके अनुष्ठानका अधिकार है, उसी प्रकार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास इन तीनों आश्रमोंमें भी उसके अनुष्ठानका अधिकार है; क्योंकि वेदमें ऐसा ही वर्णन है। मुण्डकोपनिषद् (१।२।११)-में कहा है कि— तपःश्रद्धे ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भैक्ष्यचर्यां चरन्तः। सूर्यद्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्यव्ययात्मा॥ 'जो वनमें रहनेवाले (वानप्रस्थ), शान्त स्वभाववाले विद्वान् गृहस्थ तथा भिक्षासे निर्वाह करनेवाले ब्रह्मचारी और संन्यासी तप एवं श्रद्धाका सेवन करते हैं, वे रजोगुणसे रहित साधक सूर्यके मार्गसे वहाँ चले जाते हैं, जहाँ जन्म-मृत्युसे रहित नित्य अविनाशी परम पुरुष निवास करता है।' इसके सिवा अन्य श्रुतियोंमें भी इसी प्रकारका वर्णन मिलता है। (प्र० उ० १।१०) इससे यह सिद्ध होता है कि विद्या कर्मोंका अंग नहीं है, क्योंकि संन्यासीके लिये वैदिक यज्ञादि कर्मोंका विधान नहीं है और उनका ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। यदि ब्रह्मविद्याको कर्मका अंग मान लिया जाय तो संन्यासीके द्वारा उसका अनुष्ठान कैसे सम्भव होगा ? सम्बन्ध—अब जैमिनिकी ओरसे पुनः शंका उपस्थित की जाती है— परामर्शं जैमिनिरचोदना चापवदति हि॥ ३।४।१८॥ जैमिनिः=आचार्य जैमिनि; परामर्शम्=उक्त श्रुतिमें संन्यास-आश्रमका अनुवादमात्र मानते हैं, विधि नहीं; हि=क्योंकि; अचोदना=उसमें विधिसूचक क्रियापदका प्रयोग नहीं है; च=इसके सिवा; अपवदति=श्रुति संन्यासका अपवाद (निषेध) करती है।