वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र २० ] अध्याय १ ३७ स्वतः सिद्ध हो जाता है कि जड प्रकृति या जीवात्माको 'आनन्दमय' नहीं माना जा सकता; क्योंकि चेतन जीवात्माका जड प्रकृतिमें अथवा अपने ही-जैसे परतन्त्र दूसरे किसी जीवमें लय होना नहीं बन सकता। इसलिये एकमात्र परब्रह्म परमेश्वर ही 'आनन्दमय' शब्दका वाच्यार्थ है और वही सम्पूर्ण जगत्का कारण है; दूसरा कोई नहीं। सम्बन्ध — तैत्तिरीय-श्रुतिमें जहाँ आनन्दमयका प्रकरण आया है, वहाँ 'विज्ञानमय' शब्दसे जीवात्माको ग्रहण किया गया है, किंतु बृहदारण्यक (४। ४।२२)-में 'विज्ञानमय' को हृदयाकाशमें शयन करनेवाला अन्तरात्मा बताया गया है। अतः जिज्ञासा होती है कि वहाँ 'विज्ञानमय' शब्द जीवात्माका वाचक है अथवा ब्रह्मका ? इसी प्रकार छान्दोग्य (१।६।६)-में जो सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुषका वर्णन आया है, वहाँ भी यह शंका हो सकती है कि इस मन्त्रमें सूर्यके अधिष्ठाता देवताका वर्णन हुआ है या ब्रह्मका ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है- अन्तस्तद्धर्मोपदेशात् ॥ १। १। २०॥ अन्तः=हृदयके भीतर शयन करनेवाला विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित हिरण्यमय पुरुष ब्रह्म है; तद्धर्मोपदेशात् = क्योंकि (उसमें) उस ब्रह्मके धर्मोंका उपदेश किया गया है। व्याख्या - उपर्युक्त बृहदारण्यक श्रुतिमें वर्णित विज्ञानमय पुरुषके लिये इस प्रकार विशेषण आये हैं— 'सर्वस्य वशी सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः... एष सर्वेश्वर एष भूतपालः' इत्यादि। तथा छान्दोग्यवर्णित सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती पुरुषके लिये 'सर्वेभ्यः पाप्मभ्य उदितः' (सब पापोंसे ऊपर उठा हुआ) यह विशेषण दिया गया है। ये विशेषण परब्रह्म परमेश्वरमें ही सम्भव हो सकते हैं। किसी भी स्थितिको प्राप्त देव, मनुष्य आदि योनियोंमें रहनेवाले जीवात्माके ये धर्म नहीं हो सकते। इसलिये वहाँ परब्रह्म परमेश्वरको ही विज्ञानमय तथा सूर्यमण्डलान्तर्वर्ती हिरण्मय पुरुष समझना चाहिये; अन्य किसीको नहीं।