वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ सम्बन्ध- आनन्दका हेतु जो सत्त्वगुण है, वह त्रिगुणात्मिका जड प्रकृतिमें भी विद्यमान है ही; अतः 'आनन्दमय' शब्दको प्रकृतिका ही वाचक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं— कामाच्च नानुमानापेक्षा ॥ १ । १ । १८ ॥ च=तथा; कामात्=('आनन्दमय' में) कामनाका कथन होनेसे; अनुमानापेक्षा= (यहाँ) अनुमान-कल्पित जड प्रकृतिको 'आनन्दमय' शब्दसे ग्रहण करनेकी आवश्यकता; न=नहीं है। व्याख्या-उपनिषद्में जहाँ 'आनन्दमय' का प्रसंग आया है, वहाँ 'सोऽकामयत' इस वाक्यके द्वारा आनन्दमयमें सृष्टिविषयक कामनाका होना बताया गया है, जो कि जड प्रकृतिके लिये असम्भव है। अतः उस प्रकरणमें वर्णित 'आनन्दमय' शब्दसे जड प्रकृतिको नहीं ग्रहण किया जा सकता। सम्बन्ध - परब्रह्म परमात्माके सिवा, प्रकृति या जीवात्मा कोई भी 'आनन्दमय' शब्दसे गृहीत नहीं हो सकता; इस बातको दृढ़ करते हुए प्रकरणका उपसंहार करते हैं— अस्मिन्नस्य च तद्योगं शास्ति ॥ १ । १ । १९॥ च=इसके सिवा; अस्मिन् = इस प्रकरणमें ( श्रुति); अस्य = इस जीवात्माका; तद्योगम् =उस आनन्दमयसे संयुक्त होना (मिल जाना); शास्ति= बतलाती है (इसलिये जड तत्त्व या जीवात्मा आनन्दमय नहीं है)। व्याख्या-तै० उ० (२।८)-में श्रुति कहती है कि 'स य एवंविद् .... एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति' अर्थात् 'इस आनन्दमय परमात्माके तत्त्वको इस प्रकार जाननेवाला विद्वान् अन्नमयादि समस्त शरीरोंके आत्मस्वरूप आनन्दमय ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।' बृहदारण्यकमें भी श्रुतिका कथन है कि 'ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति' - (कामनारहित आप्तकाम पुरुष) ब्रह्मरूप होकर ही ब्रह्ममें लीन होता है' (बृ० उ० ४ । ४ । ६)। श्रुतिके इन वचनोंसे यह