वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १६-१७ ] अध्याय १ ३५ नेतरोऽनुपपत्तेः ॥ १ । १ । १६ ॥ इतरः:=ब्रह्मसे भिन्न जो जीवात्मा है, वह; न=आनन्दमय नहीं हो सकता; अनुपपत्तेः:=क्योंकि पूर्वापरके वर्णनसे यह बात सिद्ध नहीं होती। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें आनन्दमयका वर्णन करनेके अनन्तर यह बात कही गयी है कि 'सोऽकामयत। बहु स्यां प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा इद ँ सर्वमसृजत।' 'उस आनन्दमय परमात्माने यह इच्छा की कि मैं बहुत होऊँ, जन्म ग्रहण करूँ, फिर उसने तप (संकल्प) किया। तप करके समस्त जगत्की रचना की।' (तै० उ० २। ६) यह कथन जीवात्माके लिये उपयुक्त नहीं है, क्योंकि जीवात्मा अल्पज्ञ और परिमित शक्तिवाला है, जगत्की रचना आदि कार्य करनेकी उसमें सामर्थ्य नहीं है। अतः 'आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता। सम्बन्ध—यही बात सिद्ध करनेके लिये दूसरा कारण बतलाते हैं— भेदव्यपदेशाच्च ॥ १ । १ । १७ ॥ भेदव्यपदेशात्=जीवात्मा और परमात्माको एक-दूसरेसे भिन्न बतलाया गया है, इसलिये; च=भी ('आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं हो सकता)। व्याख्या—उक्त वल्लीमें आगे चलकर (सातवें अनुवाकमें) कहा है कि 'यह जो ऊपरके वर्णनमें 'सुकृत' नामसे कहा गया है वही रसस्वरूप है। यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है।'* इस प्रकार यहाँ परमात्माको आनन्ददाता और जीवात्माको उसे पाकर आनन्दयुक्त होनेवाला बताया गया है। इससे दोनोंका भेद सिद्ध होता है। इसलिये भी 'आनन्दमय' शब्द जीवात्माका वाचक नहीं है।
- देखो सूत्र १२ की व्याख्या।