वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमें आनन्दमयको आनन्द प्रदान करनेवाला बताया गया है (तै० उ० २। ७)।* जो सबको आनन्द प्रदान करता है, वह स्वयं आनन्दघन है, इसमें तो कहना ही क्या है; क्योंकि जो अखण्ड आनन्दका भण्डार होगा, वही सदा सबको आनन्द प्रदान कर सकेगा। इसलिये यहाँ मयट् प्रत्ययको विकारका बोधक न मानकर प्रचुरताका बोधक मानना ही ठीक है। सम्बन्ध—केवल मयट् प्रत्यय प्रचुरताका बोधक होनेसे ही यहाँ 'आनन्दमय' शब्द ब्रह्मका वाचक है, इतना ही नहीं, किंतु— मान्त्रवर्णिकमेव च गीयते ॥ १ । १ । १५ ॥ च=तथा; मान्त्रवर्णिकम्=मन्त्राक्षरोंमें जिसका वर्णन किया गया है, उस ब्रह्मका; एव=ही; गीयते=(यहाँ) प्रतिपादन किया जाता है (इसलिये भी आनन्दमय ब्रह्म ही है)। व्याख्या—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके आरम्भमें जो यह मन्त्र आया है कि—‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्। सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता।' अर्थात् 'ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है। वह ब्रह्म विशुद्ध आकाशस्वरूप परम धाममें रहते हुए ही सबके हृदयरूप गुफामें छिपा हुआ है; जो उसको जानता है, वह सबको भलीभाँति जाननेवाले ब्रह्मके साथ समस्त भोगोंका अनुभव करता है।' इस मन्त्रद्वारा वर्णित ब्रह्मको यहाँ 'मान्त्रवर्णित' कहा गया है। जिस प्रकार उक्त मन्त्रमें उस परब्रह्मको सबका अन्तरात्मा बताया गया है, उसी प्रकार ब्राह्मण-ग्रन्थमें 'आनन्दमय' को सबका अन्तरात्मा कहा है; इस प्रकार दोनों स्थलोंकी एकताके लिये यही मानना उचित है कि 'आनन्दमय' शब्द यहाँ ब्रह्मका ही वाचक है, अन्य किसीका नहीं। सम्बन्ध—यदि 'आनन्दमय' शब्दको जीवात्माका वाचक मान लिया जाय तो क्या हानि है? इस पर कहते हैं—
- देखो सूत्र १२ की व्याख्या।