भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 486 में से

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पृष्ठ 36

सूत्र १३-१४ ] अध्याय १ ३३ सर्वनियन्ता, सर्वव्यापी, सबके आत्मस्वरूप परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं। सम्बन्ध - यहाँ यह शंका होती है कि 'आनन्दमय' शब्दमें जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकार अर्थका बोधक है और परब्रह्म परमात्मा निर्विकार है। अतः जिस प्रकार अन्नमय आदि शब्द ब्रह्मके वाचक नहीं हैं, वैसे ही, उन्हींके साथ आया हुआ यह 'आनन्दमय' शब्द भी परब्रह्मका वाचक नहीं होना चाहिये। इसपर कहते हैं- विकारशब्दान्नेति चेन्न प्राचुर्यात् ॥ १। १। १३॥ चेत् = यदि कहो; विकारशब्दात् = 'मयट्' प्रत्यय विकारका बोधक होनेसे; न=आनन्दमय शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता; इति = तो यह कथन; न=ठीक नहीं है; प्राचुर्यात्=क्योंकि 'मयट्' प्रत्यय यहाँ प्रचुरताका बोधक है (विकारका नहीं)। व्याख्या - 'तत्प्रकृतवचने मयट्' (पा० सू० ५। ४। २१) इस पाणिनिसूत्रके अनुसार प्रचुरताके अर्थमें भी 'मयट्' प्रत्यय होता है; अतः यहाँ 'आनन्दमय' शब्दमें जो 'मयट्' प्रत्यय है, वह विकारका नहीं, प्रचुरता-अर्थका ही बोधक है अर्थात् वह ब्रह्म आनन्दघन है, इसीका द्योतक है। इसलिये यह कहना ठीक नहीं है कि 'आनन्दमय' शब्द ब्रह्मका वाचक नहीं हो सकता। परब्रह्म परमेश्वर आनन्दघनस्वरूप है, इसलिये उसे 'आनन्दमय' कहना सर्वथा उचित है। सम्बन्ध - यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि जब 'मयट्' प्रत्यय विकारका बोधक भी होता है, तब यहाँ उसे प्रचुरताका ही बोधक क्यों माना जाय ? विकारबोधक क्यों न मान लिया जाय ? इसपर कहते हैं- तद्धेतुव्यपदेशाच्च ॥ १। १। १४॥ तद्धेतुव्यपदेशात् =(उपनिषदोंमें ब्रह्मको) उस आनन्दका हेतु बताया गया है, इसलिये; च=भी (यहाँ 'मयट्' प्रत्यय विकार अर्थका बोधक नहीं है)।

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