भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 486 में से

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३२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ जाननेका फल उसीकी प्राप्ति बताया गया और वहीं ब्रह्मानन्दवल्लीको समाप्त कर दिया गया है। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि इस प्रकरणमें आनन्दमय नामसे किसका वर्णन हुआ है, परमेश्वरका? या जीवात्माका? अथवा अन्य किसीका? इसपर कहते हैं— आनन्दमयोऽभ्यासात् ॥ १। १। १२ ॥ अभ्यासात् = श्रुतिमें बारम्बार 'आनन्द' शब्दका ब्रह्मके लिये प्रयोग होनेके कारण; आनन्दमयः = 'आनन्दमय' शब्द (यहाँ परब्रह्म परमेश्वरका ही वाचक है)। व्याख्या—किसी बातको दृढ़ करनेके लिये बारम्बार दुहरानेको 'अभ्यास' कहते हैं। तैत्तिरीय तथा बृहदारण्यक आदि 'अनेक उपनिषदोंमें 'आनन्द' शब्दका ब्रह्मके अर्थमें बारम्बार प्रयोग हुआ है; जैसे—तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीके छठे अनुवाकमें 'आनन्दमय' का वर्णन आरम्भ करके सातवें अनुवाकमें उसके लिये 'रसो वै सः। रसँह्येवायं लब्ध्वाऽऽनन्दी भवति। को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष ह्येवानन्दयाति।' (२।७) अर्थात् 'वह आनन्दमय ही रसस्वरूप है, यह जीवात्मा इस रसस्वरूप परमात्माको पाकर आनन्दयुक्त हो जाता है। यदि वह आकाशकी भाँति परिपूर्ण आनन्दस्वरूप परमात्मा नहीं होता तो कौन जीवित रह सकता, कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता? सचमुच यह परमात्मा ही सबको आनन्द प्रदान करता है।' ऐसा कहा गया है। तथा 'सैषाऽऽनन्दस्य मीमाँसा भवति', 'एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति।' (तै० उ० २।८) 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न बिभेति कुतश्चन' (तै० उ० २।९) 'आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्' (तै० उ० ३। ६) 'विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' (बृह० उ० ३। ९। २८)—इत्यादि प्रकारसे श्रुतियोंमें जगह-जगह परब्रह्मके अर्थमें 'आनन्द' एवं 'आनन्दमय' शब्दका प्रयोग हुआ है। इसलिये 'आनन्दमय' नामसे यहाँ उस सर्वशक्तिमान्, समस्त जगत्के परम कारण,