वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ११ ] अध्याय १ ३१ श्रुतत्वाच्च ॥ १। १। ११॥ श्रुतत्वात् = श्रुतियोंद्वारा जगह-जगह यही बात कही गयी है, इसलिये; च=भी (परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण सिद्ध होता है)। व्याख्या—'स कारणं करणाधिपाधिपो न चास्य कश्चिज्जनिता न चाधिपः॥' (श्वेता० ६।९)—'वह परमात्मा सबका परम कारण तथा समस्त करणोंके अधिष्ठाताओंका भी अधिपति है। कोई भी न तो इसका जनक है और न स्वामी ही है।' 'स विश्वकृत्' (श्वेता० ६।१६)—'वह परमात्मा समस्त विश्वका स्रष्टा है।' 'अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे' (मु० उ० २।१।९) 'इस परमेश्वरसे समस्त समुद्र और पर्वत उत्पन्न हुए हैं।'— इत्यादिरूपसे उपनिषदोंमें स्थान-स्थानपर यही बात कही गयी है कि सर्वशक्तिमान्, सर्वज्ञ, परब्रह्म परमेश्वर ही जगत्का कारण है; अतः श्रुति- प्रमाणसे यही सिद्ध होता है कि सर्वाधार परमात्मा ही सम्पूर्ण जगत्का अभिन्न निमित्तोपादान कारण है; जड प्रकृति नहीं। सम्बन्ध—'स्वाप्ययात्' १।१।९ सूत्रमें जीवात्माके स्व (परमात्मा)- में विलीन होनेकी बात कहकर यह सिद्ध किया गया कि जड प्रकृति जगत्का कारण नहीं है। किंतु 'स्व' शब्द प्रत्यक्चेतन (जीवात्मा)-के अर्थमें भी प्रसिद्ध है; अतः यह सिद्ध करनेके लिये कि प्रत्यक्चेतन भी जगत्का कारण नहीं है, आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद्की ब्रह्मानन्दवल्लीमें सृष्टिकी उत्पत्तिका वर्णन करते हुए सर्वात्म-स्वरूप परब्रह्म परमेश्वरसे ही आकाश आदिके क्रमसे सृष्टि बतायी गयी है। (अनु० १, ६, ७)। उसी प्रसंगमें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय इन पाँचों पुरुषोंका वर्णन आया है। वहाँ क्रमशः अन्नमयका प्राणमयको, प्राणमयका मनोमयको, मनोमयका विज्ञानमयको और विज्ञानमयका आनन्दमयको अन्तरात्मा बताया गया है? आनन्दमयका अन्तरात्मा दूसरे किसीको नहीं बताया गया है; अपितु उसीसे जगत्की उत्पत्ति बताकर आनन्दकी महिमाका वर्णन करते हुए सर्वात्मा आनन्दमयको