वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ (मा० उ० २) 'सबका अन्तर्वर्ती यह तेरा आत्मा है।' (बृह० उ० ३। ४।१) 'यह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।' (बृह० उ० ३।७।३) इसी प्रकार उद्दालकने अपने पुत्र श्वेतकेतुसे बार-बार कहा है कि 'वह सत्य है, वह आत्मा है, वह तू है।' (छा० उ० ६।८ से १६ वें खण्डतक) 'जो आत्मामें स्थित हुआ आत्माका अन्तर्यामी है, जिसको आत्मा नहीं जानता, जिसका आत्मा शरीर है, वह तेरा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है' (शतपथब्रा० १४।५।३०)।* इस प्रकार श्रुतिमें उस परब्रह्म परमात्माको अपना अन्तर्यामी आत्मा मानकर उपासना करनेका विधान आता है तथा भगवद्गीतामें भी भगवान्ने अपनेको सबका अन्तर्यामी बताया है (गीता १८। ६१)। दूसरी श्रुतिमें भी उस ब्रह्मको हृदयरूप गुहामें निहित बताकर उसे जाननेवाले विद्वान्की महिमाका वर्णन किया गया है। (तै० उ० २।१) इसलिये साधकको उचित है कि वह परमेश्वरको अपना अन्तर्यामी आत्मा समझकर उसी भावसे उसकी उपासना करे। सम्बन्ध— क्या प्रतीकोपासनामें भी ऐसी ही भावना करनी चाहिये? इस जिज्ञासापर कहते हैं— न प्रतीके न हि सः॥ ४। १।४॥ प्रतीके=प्रतीकमें; न=आत्मभाव नहीं करना चाहिये; हि=क्योंकि; सः=वह; न=उपासकका आत्मा नहीं है। व्याख्या—'मन ही ब्रह्म है, इस प्रकार उपासना करे।' (छा० उ० ३।१८।१) 'आकाश ब्रह्म है, ऐसी उपासना करे।' (छा० उ० ३।१८।१) 'आदित्य ब्रह्म है, यह आदेश है।' (छा० उ० ३।१९। १) इस प्रकार जो भिन्न-भिन्न पदार्थोंमें ब्रह्मरूपसे उपासना करनेका कथन है, वही प्रतीकोपासना है। वहाँ प्रतीकमें आत्मभाव नहीं करना चाहिये; क्योंकि वह
- यह मन्त्र सूत्र १।२।२० की टिप्पणीमें आ गया है।