वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 424, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १७ ] अध्याय ४ ४२१ विधान; तु=तो; तत्कार्याय=उन-उन विहित कर्मोंकी रक्षा करनेके लिये; एव=ही है; तद्दर्शनात्=यही श्रुतियों और स्मृतियोंमें देखा गया है। व्याख्या-ज्ञानी महापुरुषोंके लिये जो श्रुतिमें विधान किये हुए अपने आश्रम-सम्बन्धी अग्निहोत्रादि कर्म जीवनपर्यन्त करनेकी बात कही गयी है, (ब्र० सू० ३।४।३२) वह कथन उन कर्मोंकी रक्षाके उद्देश्यसे ही है। अर्थात् साधारण जनता उसकी देखा-देखी कर्मोंका त्याग करके भ्रष्ट न हो; अपितु अपने-अपने कर्मोंमें श्रद्धापूर्वक लगी रहे; इस प्रकार लोकसंग्रहके लिये वैसा कहा गया है, अन्य किसी उद्देश्यसे नहीं। यह बात श्रुतियों और स्मृतियोंमें भी देखी जाती है। श्रुतिमें तो जनक, अश्वपति, याज्ञवल्क्य आदि ज्ञानी महापुरुषोंके दृष्टान्तसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेका विधान सिद्ध किया गया है और श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान्ने स्वयं कहा है कि 'हे पार्थ ! मेरे लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है, मुझे तीनों लोकोंमें किसी भी अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति नहीं करनी है, तो भी मैं कर्मोंमें संलग्न रहता हूँ; क्योंकि यदि मैं कभी सावधानीके साथ कर्म न करूँ तो ये सब लोग मेरा अनुकरण करके नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं उनके नाशमें निमित्त बनूँ।' इत्यादि (३। २२ से २४)। तथा यह भी कहा है कि 'विद्वान् पुरुष कर्मासक्त अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न न करे, किंतु स्वयं उन्हींकी भाँति कर्म करता हुआ उनको कर्मोंमें लगाये रखे' (३।२५)। 'यज्ञ-रक्षाके लिये किये जानेवाले कर्मोंसे भिन्न कर्मोंद्वारा ही यह मनुष्य बन्धनमें पड़ता है।' इत्यादि (३।९)। इस प्रकार श्रुति और स्मृतिप्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि विद्वान्के लिये कर्म करनेका कथन केवल लोकसंग्रहके लिये है। सम्बन्ध-आश्रमके लिये विहित कर्मोंके सिवा, अन्य कर्म उनके द्वारा किये जाते हैं या नहीं? इस जिज्ञासापर कहते हैं- अतोऽन्यापि ह्येकेषामुभयोः ॥ ४।१।१७॥ अतः=इनसे; अन्यापि=भिन्न क्रिया भी; उभयोः=ज्ञानी और साधक