वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२२ वेदान्त-दर्शन [ पाद १ दोनोंके लिये; हि=ही; एकेषाम्=किसी एक शाखावालोंके मतमें विहित है। व्याख्या - श्रुतिमें कहा है- 'आजीवन शास्त्रविहित कर्मोंको करते हुए ही इस लोकमें सौ वर्षतक जीनेकी इच्छा करे।' इत्यादि (ईशा० २) 'तथा जो कर्म और ज्ञान- इन दोनोंको साथ-साथ जानता है, वह कर्मोंद्वारा मृत्युसे तरकर ज्ञानसे अमृत्युको प्राप्त होता है।' (ईशा० ११) इस प्रकार किसी- किसी शाखावालोंके मतमें ज्ञानी और साधक दोनोंके लिये ही इन आश्रम- सम्बन्धी कर्मोंके सिवा अन्य सभी विहित कर्मोंका अनुष्ठान आजीवन करते रहनेका विधान है। अतः ज्ञानी लोकसंग्रहके लिये प्रत्येक शुभ कर्मका अनुष्ठान कर्तापनके अहंकारसे रहित तथा कर्मासक्ति और फलासक्तिसे सर्वथा अतीत हुआ कर सकता है; क्योंकि ज्ञानोत्तरकालमें किये जानेवाले किसी भी कर्मसे उसका लेप नहीं होता (गीता ४।२२; १८।१७) । सम्बन्ध - क्या विद्या और कर्मके समुच्चयका भी श्रुतिमें विधान है? इसपर कहते हैं- यदेव विद्ययेति हि॥४।१।१८॥ यत्=जो; एव=भी; विद्यया=विद्याके सहित (किया जाता है); इति = इस प्रकार कथन करनेवाली श्रुति है; हि = इसलिये (विद्या कर्मोंका अंग किसी जगह हो सकती है)। व्याख्या - श्रुतिमें कहा है कि 'जो कर्म विद्या, श्रद्धा और रहस्यज्ञानके सहित किया जाता है, वह अधिक सामर्थ्यसम्पन्न हो जाता है।' (छा० उ० १।१।१०) यह श्रुति कर्मोंके अंगभूत उद्गीथ आदिकी उपासनाके प्रकरणकी है, इसलिये इसका सम्बन्ध वैसी ही उपासनाओंसे है तथा यह विद्या भी ब्रह्मविद्या नहीं है। अतः ज्ञानीसे या परमात्माकी प्राप्तिके लिये अभ्यास करनेवाले अन्य उपासकोंसे इस श्रुतिका सम्बन्ध नहीं है। इसलिये यह सिद्ध होता है कि उस प्रकारकी उपासनामें कही हुई विद्या ही उन कर्मोंका अंग हो सकती है, ब्रह्मविद्या नहीं।