वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 426, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्र १९] अध्याय ४ ४२३ सम्बन्ध—ज्ञानीके प्रारब्ध कर्मोंका नाश कैसे होता है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— भोगेन त्वितरे क्षपयित्वा सम्पद्यते॥४।१।१९॥ इतरे = संचित और क्रियमाणके सिवा दूसरे प्रारब्धरूप शुभाशुभ कर्मोंको; तु = तो; भोगेन = उपभोगके द्वारा; क्षपयित्वा = क्षीण करके; सम्पद्यते = (वह ज्ञानी) परमात्माको प्राप्त हो जाता है। व्याख्या—ऊपर कहा जा चुका है कि विद्वान्के पूर्वकृत संचित कर्म तो भस्म हो जाते हैं और क्रियमाण कर्मोंसे उसका सम्बन्ध नहीं होता; शेष रहे शुभाशुभ प्रारब्ध कर्म, उन दोनोंका उपभोगके द्वारा नाश करके ज्ञानी पुरुष परम पदको प्राप्त हो जाता है; यह बात श्रुतिमें कही गयी है (छा० उ० ६।१४।२)। पहला पाद सम्पूर्ण