भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

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सूत्र २५ ] अध्याय १ ४१ करते हुए उसके दूसरे पादको 'तैजस' कहा है। यह 'तैजस' भी 'ज्योति' का पर्याय ही है। अतः 'ज्योतिः' की भाँति 'तैजस' शब्द भी ब्रह्मका ही वाचक है, जीवात्मा या अन्य किसी प्रकाशका नहीं। इस बातका निर्णय भी इसी प्रसंगके अनुसार समझ लेना चाहिये। सम्बन्ध — यहाँ यह शंका होती है कि छान्दोग्योपनिषद्के तीसरे अध्यायके बारहवें खण्डमें 'गायत्री' के नामसे प्रकरणका आरम्भ हुआ है। गायत्री एक छन्दका नाम है। अतः उस प्रसंगमें ब्रह्मका वर्णन है, यह कैसे माना जाय ? इसपर कहते हैं— छन्दोऽभिधानान्नेति चेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगदात् तथा हि दर्शनम् ॥ १ । १ । २५ ॥ चेत्=यदि कहो (उस प्रकरणमें); छन्दोऽभिधानात्=गायत्रीछन्दका कथन होनेके कारण (उसीके चार पादोंका वर्णन है); न=ब्रह्मके चार पादोंका वर्णन नहीं है; इति न=तो यह ठीक नहीं (क्योंकि); तथा=उस प्रकारके वर्णनद्वारा; चेतोऽर्पणनिगदात्=ब्रह्ममें चित्तका समर्पण बताया गया है; तथा हि दर्शनम्=वैसा ही वर्णन दूसरी जगह भी देखा जाता है। व्याख्या — पूर्व प्रकरणमें 'गायत्री ही यह सब कुछ है' (छा० उ० ३ । १२ । १) इस प्रकार गायत्रीछन्दका वर्णन होनेसे उसीके चार पादोंका वहाँ वर्णन है, ब्रह्मका नहीं; ऐसी धारणा बना लेना ठीक नहीं है; क्योंकि गायत्री नामक छन्दके लिये यह कहना नहीं बन सकता कि यह जड-चेतनात्मक सम्पूर्ण जगत् गायत्री ही है। इसलिये यहाँ ऐसा समझना चाहिये कि सबके परम कारण सर्वात्मक परब्रह्म परमेश्वरमें चित्तका समाधान करनेके लिये उस ब्रह्मका ही वहाँ इस प्रकार गायत्री-नामसे वर्णन किया गया है। इसी तरह अन्यत्र भी उद्गीथ, प्रणव आदि नामोंके द्वारा ब्रह्मका वर्णन देखा जाता है। सूक्ष्म- तत्त्वमें बुद्धिका प्रवेश करानेके लिये, किसी प्रकारकी समानताको लेकर स्थूल वस्तुके नामसे उसका वर्णन करना उचित ही हैं।