वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 447, कुल 486 में से
संदर्भ में पढ़ें४४४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ उसको आगे ले जानेवाले अर्चि आदि भी यदि चेतन न हों तो मार्गको जाननेवाला कोई न रहनेसे देवयान और पितृयानमार्गका ज्ञान होना असम्भव हो जायगा। इसलिये अर्चि आदि शब्दोंसे उन-उनके अभिमानी देवताओंका वर्णन मानना आवश्यक है। तभी उनके द्वारा ब्रह्मलोक- तक पहुँचानेका कार्य सिद्ध हो सकेगा। अतः मार्गमें जिन-जिन लोकोंका वर्णन आया है, उनसे उन-उन लोकोंके अधिष्ठाता देवताको ही समझना चाहिये, अपने लोकसे अगले लोकमें पहुँचा देना ही उनका काम है। सम्बन्ध—विद्युत्-लोकके अनन्तर यह कहा गया है कि वह अमानव पुरुष उनको ब्रह्मके पास पहुँचा देता है। (छा० उ० ५।१०।१) तब बीचमें आनेवाले वरुण, इन्द्र और प्रजापतिके लोकोंके अभिमानी देवताओंका क्या काम रहेगा ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— वैद्युतेनैव ततस्तच्छ्रुतेः ॥ ४।३।६ ॥ ततः = वहाँसे आगे ब्रह्मलोकतक; वैद्युतेन = विद्युत्-लोकमें प्रकट हुए अमानव पुरुषद्वारा; एव = ही (पहुँचाये जाते हैं); तच्छ्रुतेः = क्योंकि वैसा ही श्रुतिमें कहा है। व्याख्या—वहाँसे उनको वह विद्युत्-लोकमें प्रकट हुआ अमानव पुरुष ब्रह्मके पास पहुँचा देता है, इस प्रकार श्रुतिमें स्पष्ट कहा जानेके कारण यही सिद्ध होता है कि विद्युत्-लोकसे आगे ब्रह्मलोकतक वही विद्युत्-लोकमें प्रकट अमानव पुरुष उनको पहुँचाता है, बीचके लोकोंके जो अभिमानी देवता हैं, उनका इतना ही काम है कि वे अपने लोकोंमें होकर जानेके लिये उनको मार्ग दे दें और अन्य आवश्यक सहयोग करें। सम्बन्ध—ब्रह्मविद्याका उपासक अधिकारी विद्वान् वहाँ ब्रह्मलोकमें जिसको प्राप्त होता है, वह परब्रह्म है या सबसे पहले उत्पन्न होनेवाला ब्रह्मा ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया