वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ व्याख्या—वह अमानव पुरुष इनको ब्रह्मके समीप पहुँचा देता है (छा० उ० ५।१०।२) श्रुतिके इस वाक्यमें कहा हुआ 'ब्रह्म' शब्द मुख्यतया परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है, इसलिये अर्चि आदि मार्गसे जानेवाले परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं, कार्यब्रह्मको नहीं। जहाँ मुख्य अर्थकी उपयोगिता नहीं हो, वहीं गौण अर्थकी कल्पना की जा सकती है, मुख्य अर्थकी उपयोगिता रहते हुए नहीं। वह परब्रह्म परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण होनेपर भी उसके परम धामका प्रतिपादन और वहाँ विद्वान् उपासकोंके जानेका वर्णन श्रुतियों (क० उ० १।३।९), (प्र० उ० १।१०) और स्मृतियोंमें (गीता १५। ६) जगह-जगह किया गया है। इसलिये उसके लोकविशेषमें गमन करनेके लिये कहना कार्यब्रह्मका द्योतक नहीं है। बहुवचनका प्रयोग भी आदरके लिये किया जाना सम्भव है तथा उस सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके अपने लिये रचे हुए अनेक लोकोंका होना भी कोई असम्भव बात नहीं है। अतः सर्वथा यही सिद्ध होता है कि वे उसीके परमधाममें जाते हैं तथा परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त होते हैं; कार्यब्रह्मको नहीं। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं— दर्शनाच्च ॥ ४।३।१३॥ दर्शनात् = श्रुतिमें जगह-जगह गतिपूर्वक परब्रह्मकी प्राप्ति दिखायी गयी है, इससे; च=भी (यही सिद्ध होता है कि कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं है)। व्याख्या—'उनमेंसे सुषुम्णा नाड़ीद्वारा ऊपर उठकर अमृतत्वको प्राप्त होता है।' (छा० उ० ८।६।६) 'वह संसारमार्गके उस पार उस विष्णुके परमपदको प्राप्त होता है।' (क० उ० १। ३। ९) इसके सिवा सुषुम्णा नाड़ीद्वारा शरीरसे निकलकर जानेका वर्णन कठोपनिषद्में भी वैसा ही आया है (क० उ० २।३।१६)। इस प्रकार जगह-जगह