भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 486 में से

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सूत्र १४-१५ ] अध्याय ४ ४४९

गतिपूर्वक परब्रह्म परमात्माकी प्राप्ति श्रुतिमें प्रदर्शित की गयी है। इससे यही सिद्ध होता है कि देवयानमार्गके द्वारा जानेवाले ब्रह्मविद्याके उपासक परब्रह्मको ही प्राप्त होते हैं, न कि कार्यब्रह्मको। सम्बन्ध— प्रकारान्तरसे जैमिनिके मतको दृढ़ करते हैं— न च कार्ये प्रतिपत्त्यभिसन्धिः ॥ ४ । ३ । १४ ॥ च=इसके सिवा; प्रतिपत्त्यभिसन्धिः=उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका प्राप्तिविषयक संकल्प भी; कार्ये=कार्यब्रह्मके लिये; न=नहीं है। व्याख्या— इसके सिवा, उन ब्रह्मविद्याके उपासकोंका जो प्राप्तिविषयक संकल्प है, वह कार्यब्रह्मके लिये नहीं है अपितु परब्रह्म परमात्माको ही प्राप्त करनेके लिये उनकी साधनामें प्रवृत्ति देखी गयी है, इसलिये भी उनको कार्यब्रह्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती, परब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है। श्रुतिमें जो यह कहा गया है कि वे प्रजापतिके सभाभवनको प्राप्त होते हैं (छा० उ० ८।१४।१), उस प्रसंगमें भी उपासकका लक्ष्य प्रजापतिके लोकमें रहना नहीं है; किंतु परब्रह्मके परमधाममें जाना ही है; क्योंकि वहाँ जिस यशोंके यश यानी महायशका वर्णन है, वह ब्रह्मका ही नाम है, यह बात अन्यत्र श्रुतिमें कही गयी है (श्वेता० उ० ४।१९) तथा उसके पहले (छा० उ० ८।१३।१)-के प्रसंगसे भी यही सिद्ध हो सकता है कि वहाँ साधकका लक्ष्य परब्रह्म ही है। सम्बन्ध— इस प्रकार बादरिके पक्षकी और उसके उत्तरकी स्थापना करके अब सूत्रकार अपना मत प्रकट करते हुए सिद्धान्तका वर्णन करते हैं— अप्रतीकालम्बनान्नयतीति बादरायण उभयथा- दोषात्तत्क्रतुश्च ॥ ४।३।१५॥ अप्रतीकालम्बनान्=वाणी आदि प्रतीकका अवलम्बन करके उपासना करनेवालोंके सिवा अन्य सब उपासकोंको; नयति=(ये अर्चि आदि

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