वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४५० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ देवतालोग देवयानमार्गसे) ले जाते हैं; उभयथा=(अतः) दोनों प्रकारसे; अदोषात्=माननेमें कोई दोष न होनेके कारण; तत्क्रतुः=उनके संकल्पानुसार परब्रह्मको; च=और कार्यब्रह्मको प्राप्त कराना सिद्ध होता है; इति=यह; बादरायणः=व्यासदेव कहते हैं। व्याख्या—आचार्य बादरायण अपना सिद्धान्त बतलाते हुए यह कहते हैं कि जिस प्रकार वाणी आदिमें ब्रह्मकी प्रतीक-उपासनाका वर्णन है, उसी प्रकार दूसरी-दूसरी वैसी उपासनाओंका भी उपनिषदोंमें वर्णन है। उन उपासकोंके सिवा, जो ब्रह्मलोकोंके भोगोंको स्वेच्छानुसार भोगनेकी इच्छावाले कार्यब्रह्मके उपासक हैं और जो परब्रह्म परमात्माको प्राप्त करनेकी इच्छासे उस सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ परमेश्वरकी उपासना करनेवाले हैं उन दोनों प्रकारके उपासकोंको उनकी भावनाके अनुसार कार्यब्रह्मके भोगसम्पन्न लोकोंमें और परब्रह्म परमात्माके परमधाममें दोनों जगह ही वह अमानव पुरुष पहुँचा देता है, इसलिये दोनों प्रकारकी मान्यतामें कोई दोष नहीं है; क्योंकि उपासकका संकल्प ही इस विशेषतामें कारण है। श्रुतिमें भी यह वर्णन स्पष्ट है कि 'जिनको परब्रह्मके परमधाममें पहुँचाते हैं, उनका मार्ग भी प्रजापति ब्रह्माके लोकमें होकर ही है (कौ० उ० १।३)। अतः जिनके अन्तःकरणमें लोकोंमें रमण करनेके संस्कार होते हैं, उनको वहाँ छोड़ देते हैं, जिनके मनमें वैसे भाव नहीं होते, उनको परमधाममें पहुँचा देते हैं; परंतु देवयानमार्गसे गये हुए दोनों प्रकारके ही उपासक वापस नहीं लौटते। सम्बन्ध—प्रतीकोपासनावालोंको अर्चिमार्गसे नहीं ले जानेका क्या कारण है? इस जिज्ञासापर कहते हैं— विशेषं च दर्शयति ॥ ४।३।१६ ॥ विशेषम्=इसका विशेष कारण; च=भी; दर्शयति=श्रुति दिखाती है। व्याख्या—वाणी आदि प्रतीकोपासनावालोंको देवयानमार्गके अधिकारी