भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 454, कुल 486 में से

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सूत्र १६ ] अध्याय ४ ४५१ क्यों नहीं ले जाते, इसका विशेष कारण उन-उन उपासनाओंके विभिन्न फलका वर्णन करते हुए श्रुति स्वयं ही दिखलाती है, वाणीमें प्रतीकोपासनाका फल जहाँतक वाणीकी गति है, वहाँतक इच्छानुसार विचरण करनेकी शक्ति बताया गया है (छा० उ० ७।२।२)। इसी प्रकार दूसरी प्रतीकोपासनाओंका अलग-अलग फल बताया है, सबके फलमें एकता नहीं है। इसलिये वे उपासक देवयानमार्गसे न तो कार्यब्रह्मके लोकमें जानेके अधिकारी हैं और न परब्रह्म परमेश्वरके परमधाममें ही जानेके अधिकारी हैं; अतः उस मार्गके अधिकारी देवताओंका अर्चिमार्गसे उनको न ले जाना उचित ही है। तीसरा पाद सम्पूर्ण