भारतकोश
वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)

Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya

भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished486 पृष्ठ

पृष्ठ 52, कुल 486 में से

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सूत्र ३-४ ] अध्याय १ ४९ वाणीरहित तथा सम्भ्रमशून्य है।' इस वर्णनमें उपास्यदेवके जो उपादेय गुण बताये गये हैं, वे सब ब्रह्ममें ही संगत होते हैं। ब्रह्मको 'मनोमय' तथा 'प्राणरूप शरीरवाला' कहना भी अनुचित नहीं है; क्योंकि वह सबका अन्तर्यामी आत्मा है। केनोपनिषद्में उसको मनका भी मन तथा प्राणका भी प्राण बताया है *। इसलिये इस प्रकरणमें बतलाया हुआ उपास्यदेव परब्रह्म परमेश्वर ही है। सम्बन्ध— उपर्युक्त सूत्रमें श्रुतिवर्णित गुणोंकी उपपत्ति (संगति) ब्रह्ममें बतायी गयी, अब जीवात्मामें उन गुणोंको अनुपपत्ति बताकर पूर्वोक्त सिद्धान्तकी पुष्टि की जाती है— अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ॥ १ । २ । ३ ॥ तु=परंतु; अनुपपत्तेः=जीवात्मामें श्रुतिवर्णित गुणोंकी संगति न होनेके कारण; शारीरः=जीवात्मा; न=(इस प्रकरणमें कहा हुआ उपास्यदेव) नहीं है। व्याख्या—उपासनाके लिये श्रुतिमें जो सत्य-संकल्पता, सर्वव्यापकता, सर्वात्मकता, सर्वशक्तिमत्ता आदि गुण बताये गये हैं, वे जीवात्मामें नहीं पाये जाते; इस कारण इस प्रसंगमें बताया हुआ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है; ऐसा मानना ही ठीक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे उसी बातको सिद्ध किया जाता है— कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥ १ । २ । ४ ॥ कर्मकर्तृव्यपदेशात्=उक्त प्रकरणमें उपास्यदेवको प्राप्तिक्रियाका कर्म अर्थात् प्राप्त होनेयोग्य कहा है और जीवात्माको प्राप्तिक्रियाका कर्ता अर्थात् उस ब्रह्मको प्राप्त करनेवाला बताया है, इसलिये; च=भी (जीवात्मा उपास्य नहीं हो सकता)।

  • श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद् वाचो ह वाचँ स उ प्राणस्य प्राणः। (के० उ० १ । २)