वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५० वेदान्त-दर्शन [ पाद २ व्याख्या—छा० उ० (३।१४।४)-में कहा गया है कि 'सर्व-कर्मा' आदि विशेषणोंसे युक्त ब्रह्म ही मेरे हृदयमें रहनेवाला मेरा आत्मा है; मरनेके बाद यहाँसे जाकर परलोकमें मैं इसीको प्राप्त होऊँगा।'१ इस प्रकार यहाँ पूर्वोक्त उपास्यदेवको प्राप्त होनेयोग्य तथा जीवात्माको उसे पानेवाला कहा गया है। अतः यहाँ उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा है और उपासक जीवात्मा। यही मानना उचित है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे पुनः उक्त बातकी ही पुष्टि करते हैं— शब्दविशेषात् ॥ १ । २ । ५ ॥ शब्दविशेषात्=(उपास्य और उपासकके लिये) शब्दका भेद होनेके कारण भी (यह सिद्ध होता है कि यहाँ उपास्यदेव जीवात्मा नहीं है)। व्याख्या—छा० उ० (३।१४)-के तीसरे और चौथे मन्त्रमें कहा गया है२ कि 'यह मेरे हृदयके अंदर रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा है। यह ब्रह्म है।' इस कथनमें 'एषः' (यह) 'आत्मा' तथा 'ब्रह्म'—ये प्रथमान्त शब्द उपास्यदेवके लिये प्रयुक्त हुए हैं और 'मे' अर्थात् 'मेरा' यह षष्ठ्यन्त पद भिन्नरूपसे उपासक जीवात्माके लिये प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार दोनोंके लिये प्रयुक्त हुए शब्दोंमें भेद होनेके कारण उपास्यदेव जीवात्मासे भिन्न सिद्ध होता है। अतः जीवात्माको उपास्यदेव नहीं माना जा सकता। १-'एष म आत्मान्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद् वा सर्षपाद् वा श्यामाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वैष म आत्मान्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षाज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्यो लोकेभ्यः ॥' (छा० उ० ३।१४।३) 'सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादर एष म आत्मान्तर्हृदय एतद् ब्रह्मैतमितः प्रेत्याभिसम्भवितास्मि।' (छा० उ० ३।१४।४)। २-ये दोनों मन्त्र चौथे सूत्रकी टिप्पणीमें देखें।