वेदान्त दर्शन: ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य व हिन्दी अनुवाद सहित)
Vedanta Darshana: Brahma Sutra with Shankara Bhashya
भगवान् बादरायण व्यास व आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसूत्र ६-७ ] अध्याय १ ५१ सम्बन्ध—इसके सिवा— स्मृतेश्च ॥ १ । २ । ६ ॥ स्मृतेः=स्मृति-प्रमाणसे; च=भी (उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है)। व्याख्या—श्रीमद्भगवद्गीता आदि स्मृतिग्रन्थसे भी उपास्य और उपासकका भेद सिद्ध होता है। जैसे— मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ (गीता १२।८) 'मुझमें ही मनको लगा और मुझमें ही बुद्धिको लगा; इसके पश्चात् तू मुझमें ही निवास करेगा अर्थात् मुझे ही प्राप्त करेगा; इसमें कुछ भी संशय नहीं है।' अन्तकाले च मामेव स्मरन् मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ (गीता ८।५) 'और जो पुरुष अन्तकालमें मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्यागकर जाता है, वह मेरे स्वरूपको प्राप्त होता है; इसमें कुछ भी संशय नहीं है।' अतः इस प्रसंगके वर्णनमें उपास्यदेव परब्रह्म परमात्मा ही है, आत्मा या अन्य कोई नहीं। यही मानना ठीक है। सम्बन्ध—छा० उ० (३।१४)-के तीसरे और चौथे मन्त्रोंमें उपास्यदेवको हृदयमें स्थित—एकदेशीय बतलाया है तथा तीसरे मन्त्रमें उसे सरसों और सावाँसे भी छोटा बताया है; इस अवस्थामें उसे परब्रह्म कैसे माना जा सकता है? इसपर कहते हैं— अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेति चेन्न निचाय्य- त्वादेवं व्योमवच्च ॥ १ । २ । ७ ॥ चेत्=यदि कहो; अर्भकौकस्त्वात्=उपास्यदेव हृदयरूप छोटे स्थानवाला है, इसलिये; च=तथा; तद्व्यपदेशात्=उसे अत्यन्त छोटा बताया गया है, इस कारण; न=वह ब्रह्म नहीं हो सकता; इति न=तो यह कहना ठीक नहीं है;