भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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१३८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

सबसे अधिक महत्त्व तथा गौरव प्राप्त करो। मैं सदा तुम्हारे गुण गाऊँगा, पूजा करूँगा। तुम सदा मुझे अपने अधीन समझो। मैं तुम्हारी प्रत्येक आज्ञाका पालन करनेके लिये बाध्य रहूँगा।' ऐसा कहकर जगदीश्वर श्रीकृष्णने उन्हें सचेत किया और अपनी उन प्राणवल्लभाको सौतके कष्टसे मुक्त कर दिया।

जिन-जिन देवताओंकी जो-जो देवियाँ पतिद्वारा सम्मानित हुई हैं, उनके उस सम्मानमें श्रीकृष्णकी आराधना ही कारण है। मुने! जिनकी जैसी तपस्या है, उन्हें वैसा ही फल प्राप्त हुआ है। देवी दुर्गाने सहस्र दिव्य वर्षोंतक हिमालयपर तप करते हुए श्रीकृष्ण-चरणोंका ध्यान किया। इससे वे सबकी पूजनीया हो गयीं। सरस्वती श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये लाख दिव्य वर्षोंतक गन्धमादन पर्वतपर तपस्या करके सबकी वन्दनीया हुई हैं। लक्ष्मी सौ दिव्य युगोंतक पुष्करतीर्थमें तपस्यापूर्वक श्रीकृष्णकी आराधना करके समस्त सम्पदाओंको देनेमें समर्थ हुई हैं। सावित्री मलयाचलपर साठ हजार दिव्य वर्षोंतक तप एवं श्रीकृष्ण-चरणोंका चिन्तन करके द्विजोंकी पूजनीया हो गयी हैं।

मुने! पूर्वकालमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवने सौ मन्वन्तरोंतक श्रीकृष्ण-प्रीतिके लिये तपस्या करके सृष्टि, पालन और संहारका अधिकार प्राप्त किया था। धर्म सौ मन्वन्तरोंतक तप करके सर्वपूज्य हुए। नारद! शेषनाग, सूर्यदेव, इन्द्र तथा चन्द्रमाने भी एक-एक मन्वन्तरतक भक्तिपूर्वक श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये तप किया था। वायुदेवता सौ दिव्य युगोंतक भक्तिभावसे तपस्या करके सबके प्राण, सबके द्वारा पूजनीय तथा सबके आधार बन गये। इस प्रकार श्रीकृष्ण-प्रीतिके लिये तपस्या करके सब देवता, मुनि, मानव, राजा तथा ब्राह्मण लोकमें पूजित हुए हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे यह पुराण तथा आगमका सारभूत सारा तत्त्व सुना दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? (अध्याय ७)


पृथिवीकी उत्पत्तिका प्रसङ्ग, ध्यान और पूजनका प्रकार तथा स्तुति एवं पृथिवीके प्रति शास्त्रविपरीत व्यवहार करनेपर नरकोंकी प्राप्तिका वर्णन

नारदजीने कहा— भगवन् ! आपने बतलाया है कि श्रीकृष्णके निमेषमात्रमें ब्रह्माकी आयु पूरी हो जाती है। उनका सत्ताशून्य हो जाना ही 'प्राकृतिक प्रलय' कहा जाता है। उस समय पृथ्वी अदृश्य हो जाती है। सम्पूर्ण विश्व जलमें डूब जाता है। सब-के-सब परब्रह्म परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। तब उस समय पृथ्वी छिपकर कहाँ रहती है और सृष्टिके समय वह पुनः कैसे प्रकट हो जाती है ? धन्या, मान्या, सबकी आश्रयरूपा एवं विजयशालिनी होनेका सौभाग्य उसे पुनः कैसे प्राप्त होता है ? प्रभो! अब आप पृथिवीकी उत्पत्तिके मङ्गलमय चरित्रको सुनानेकी कृपा कीजिये।

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