भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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१४०संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण

रहा था। ब्रह्माके स्तुति करनेपर भगवान् श्रीहरि हिरण्याक्षको मारकर पृथ्वीको रसातलसे निकाल ले आये। उसे जलपर इस प्रकार रख दिया, मानो तालाबमें कमलका पत्ता हो। उसीपर ब्रह्माने सम्पूर्ण मनोहर विश्वकी रचना की। पृथ्वीकी अधिष्ठात्री एक परम सुन्दरी देवीके रूपमें थी। उसे देखकर भगवान् श्रीहरिके मनमें प्रेम हो गया। भगवान् वाराहकी कान्ति ऐसी थी, मानो करोड़ों सूर्य हों। उन्होंने अपना रूप परम मनोहर बना लिया तथा रतिके योग्य एक शय्या तैयार की। फिर उस देवीके साथ एक दिव्य वर्षतक वे एकान्तमें रहे। इसके बाद उन्होंने उस सुन्दरी देवीका संग छोड़ दिया और खेल-ही-खेलमें वे अपने पूर्व वाराहरूपसे विराजमान हो गये। उन्होंने परम साध्वी देवी पृथ्वीका ध्यान और पूजन किया। धूप, दीप, नैवेद्य, सिन्दूर, चन्दन, वस्त्र, फूल और बलि आदि सामग्रियोंसे पूजा करके भगवान्ने उससे कहा।

श्रीभगवान् बोले— शुभे! तुम सबको आश्रय प्रदान करनेवाली बनो। मुनि, मनु, देवता, सिद्ध और दानव आदि सबसे सुपूजित होकर तुम सुख पाओगी। अम्बुवाँचीके अतिरिक्त दिनमें गृहप्रवेश, गृहारम्भ, वापी एवं तड़ागके निर्माण अथवा अन्य गृहकार्यके अवसरपर देवता आदि सभी लोग मेरे वरके प्रभावसे तुम्हारी पूजा करेंगे। जो मूर्ख तुम्हारी पूजा नहीं करना चाहेंगे, उन्हें नरकमें जाना पड़ेगा।

उस समय पृथ्वी गर्भवती हो चुकी थी। उसी गर्भसे तेजस्वी मङ्गल नामक ग्रहकी उत्पत्ति हुई। भगवान्की आज्ञाके अनुसार उपस्थित सम्पूर्ण व्यक्ति पृथ्वीकी उपासना करने लगे। कण्वशाखामें कहे हुए मन्त्रोंको पढ़कर उन्होंने ध्यान किया और स्तुति की। मूलमन्त्र पढ़कर नैवेद्य अर्पण किया। यों त्रिलोकीभरमें पृथ्वीकी पूजा और स्तुति होने लगी।

नारदजीने कहा— भगवन्! पृथ्वीका किस प्रकार ध्यान किया जाता है, इसकी पूजाका प्रकार क्या है और कौन मूलमन्त्र है? सम्पूर्ण पुराणोंमें छिपे हुए इस प्रसङ्गको सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है। अतः बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् नारायण कहते हैं— मुने! सर्वप्रथम भगवान् वाराहने इस पृथ्वीकी पूजा की। उनके पश्चात् ब्रह्मा उसके पूजनमें संलग्न हुए। तदनन्तर सम्पूर्ण प्रधान मुनियों, मनुओं और मानवोंद्वारा इसका सम्मान हुआ। नारद! अब मैं इसका ध्यान, पूजन और मन्त्र बतलाता हूँ, सुनो। 'ॐ ह्रीं श्रीं वसुधायै स्वाहा' इसी मन्त्रसे भगवान् विष्णुने इसका पूजन किया था। ध्यानका प्रकार यह है— 'पृथ्वी देवीके श्रीविग्रहका वर्ण स्वच्छ कमलके समान उज्ज्वल है। मुख ऐसा जान पड़ता है, मानो शरत्पूर्णिमाका चन्द्रमा हो। सम्पूर्ण अङ्गोंमें ये चन्दन लगाये रहती हैं। रत्नमय अलंकारोंसे इनकी अनुपम शोभा होती है। ये समस्त रत्नोंकी


* सौरमानसे आर्द्रा नक्षत्रके प्रथम चरणमें पृथ्वी ऋतुमती रहती है। इतने समयका नाम अम्बुवाची है।

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