ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १४२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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दाता और प्रतिगृहीता—दोनों व्यक्ति सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर वैकुण्ठधाममें स्थान पाते हैं। जो साधु पुरुष भूमिदानके लिये दाताको उत्साहित करता है, उसे अपने मित्र एवं गोत्रके साथ वैकुण्ठमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है।
अपनी अथवा दूसरेकी दी हुई ब्राह्मणकी भूमि हरण करनेवाला व्यक्ति सूर्य एवं चन्द्रमाकी स्थितिपर्यन्त 'कालसूत्र' नामक नरकमें स्थान पाता है। इतना ही नहीं, इस पापके प्रभावसे उसके पुत्र और पौत्र आदिके पास भी पृथ्वी नहीं ठहरती। वह श्रीहीन, पुत्रहीन और दरिद्र होकर घोर रौरव नरकमें गिरता है। जो गोचरभूमिको जोतकर धान्य उपार्जन करता है और वही धान्य ब्राह्मणको देता है तो इस निन्दित कर्मके प्रभावसे उसे देवताओंके वर्षसे सौ वर्षतक 'कुम्भीपाक' नामक नरकमें रहना पड़ता है। गौओंके रहनेके स्थान, तड़ाग तथा रास्तेको जोतकर पैदा किये हुए अन्नका दान करनेवाला मानव चौदह इन्द्रकी आयुतक 'असिपत्र' नामक नरकमें रहता है। जो कामान्ध व्यक्ति एकान्तमें पृथ्वीपर वीर्य गिराता है, उसे वहाँकी जमीनमें जितने रजःकण हैं, उतने वर्षोंतक 'रौरव' नरकमें रहना पड़ता है। अम्बुवाचीमें भूमि खोदनेवाला मानव 'कृमिदंश' नामक नरकमें जाता और उसे वहाँ चार युगोंतक रहना पड़ता है। जो दूसरेके तड़ागमें पड़ी हुई कीचड़को निकालकर शुद्ध जल होनेपर स्नान करता है, उसे ब्रह्मलोकमें स्थान मिलता है। जो मन्दबुद्धि मानव भूमिपतिके पितरोंको श्राद्धमें पिण्ड न देकर श्राद्ध करता है, उसे अवश्य ही नरकगामी होना पड़ता है।
दीपक, शिवलिङ्ग, भगवतीकी मूर्ति, शङ्ख, यन्त्र, शालग्रामका जल, फूल, तुलसीदल, जपमाला, पुष्पमाला, कपूर, गोरोचन, चन्दनकी लकड़ी, रुद्राक्षकी माला, कुशकी जड़, पुस्तक और यज्ञोपवीत—इन वस्तुओंको भूमिपर रखनेसे मानव नरकमें वास करता है। गाँठमें बँधे हुए यज्ञसूत्रकी पूजा करना सभी द्विजातिवर्णोंके लिये अत्यावश्यक है। भूकम्प एवं ग्रहणके अवसरपर पृथ्वीको खोदनेसे बड़ा पाप लगता है। इस मर्यादाका उल्लङ्घन करनेसे दूसरे जन्ममें अङ्गहीन होना पड़ता है। इसपर सबके भवन बने हैं, इसलिये यह 'भूमि' कहलाती है। कश्यपकी पुत्री होनेसे 'काश्यपी' तथा स्थिररूप होनेसे 'स्थिरा' कही जाती है। महामुने! विश्वको धारण करनेसे 'विश्वम्भरा', अनन्तरूप होनेसे 'अनन्ता' तथा पृथुकी कन्या होनेसे अथवा सर्वत्र फैली रहनेसे इसका नाम 'पृथ्वी' पड़ा है।
(अध्याय ८-९)
गङ्गाकी उत्पत्तिका विस्तृत प्रसङ्ग
नारदजीने कहा— वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! पृथ्वीका यह परम मनोहर उपाख्यान सुन चुका। अब आप गङ्गाका विशद प्रसङ्ग सुनानेकी कृपा कीजिये। प्रभो! सुरेश्वरी, विष्णुस्वरूपा एवं स्वयं विष्णुपदी नामसे विख्यात गङ्गा सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें किस प्रकार और किस युगमें पधारीं? किसकी प्रार्थना एवं प्रेरणासे उन्हें वहाँ जाना पड़ा? पापका उच्छेद करनेवाला यह पवित्र एवं पुण्यप्रद प्रसंग मैं सुनना चाहता हूँ।
भगवान् नारायण कहते हैं— नारद! श्रीमान् सगर एक सूर्यवंशी सम्राट् हो चुके हैं। मनको मुग्ध करनेवाली उनकी दो रानियाँ थीं—वैदर्भी और शैब्या। उनकी पत्नी शैब्यासे एक पुत्र उत्पन्न हुआ। कुलको बढ़ानेवाले उस सुन्दर पुत्रका नाम असमञ्जस पड़ा। उनकी दूसरी पत्नी वैदर्भीने पुत्रकी कामनासे भगवान् शंकरकी उपासना की।