भारतकोश
ब्रह्मवैवर्त पुराण

ब्रह्मवैवर्त पुराण

Brahma Vaivarta Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished810 पृष्ठ

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प्रकृतिखण्ड १४३

शंकरके वरदानसे उसे भी गर्भ रह गया। पूरे सौ वर्ष व्यतीत हो जानेपर उसके गर्भसे एक मांसपिण्डकी उत्पत्ति हुई। उसे देखकर वह बहुत ही दुःखी हुई और उसने भगवान् शिवका ध्यान किया। तब भगवान् शंकर ब्राह्मणके वेषमें उसके पास पधारे और उन्होंने उस मांसपिण्डको साठ हजार भागोंमें बाँट दिया। वे सभी टुकड़े पुत्ररूपमें परिणत हो गये। उनके बल और पराक्रमकी सीमा नहीं रही। उनके परम तेजस्वी कलेवरने ग्रीष्म-ऋतुके मध्याह्नकालीन सूर्यकी प्रभाका मानो हरण कर लिया था; परंतु वे सभी तेजस्वी कुमार कपिलमुनिके शापसे जलकर भस्म हो गये। यह दुःखद समाचार सुनकर राजा सगरकी आँखें निरन्तर जल बहाने लगीं। वे बेचारे घोर जंगलमें चले गये। तब उनके पुत्र असमञ्जसने गङ्गाको ले आनेके लिये तपस्या आरम्भ कर दी। वे बहुत कालतक तपस्या करते रहे। अन्तमें कालने उन्हें अपना ग्रास बना लिया। असमञ्जसके पुत्रका नाम अंशुमान् था। गङ्गाको ले आनेके लिये लम्बे समयतक तपस्या करनेके पश्चात् वे भी कालके गालमें चले गये।

अंशुमान्‌के पुत्र भगीरथ थे। भगीरथ भगवान्‌के परम भक्त, विद्वान्, श्रीहरिमें अटूट श्रद्धा रखनेवाले, गुणवान् तथा वैष्णव पुरुष थे। गङ्गाको ले आनेका निश्चय करके उन्होंने बहुत समयतक तपस्या की। अन्तमें भगवान् श्रीकृष्णके उन्हें साक्षात् दर्शन हुए। उस समय भगवान्‌के श्रीविग्रहसे ग्रीष्मकालीन करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाश फैल रहा था। उनके दो भुजाएँ थीं। वे हाथमें मुरली लिये हुए थे। उनकी किशोर अवस्था थी। वे गोपके वेषमें पधारे थे। भक्तोंपर कृपा करनेके लिये उन्होंने यह रूप धारण किया था। मुने! भगवान् श्रीकृष्ण परिपूर्णतम परब्रह्म हैं। वे चाहे जैसा रूप बना सकते हैं। उस समय ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि उनकी स्तुति कर रहे थे और मुनियोंने उनके सामने अपने मस्तक झुका रखे थे। सदा निर्लिप्त, सबके साक्षी, निर्गुण, प्रकृतिसे परे तथा भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले उन भगवान् श्रीकृष्णका मुख मुस्कानसे सुशोभित था। विशुद्ध चिन्मय वस्त्र तथा दिव्य रत्नोंसे निर्मित आभूषण उनके श्रीविग्रहको सुशोभित कर रहे थे। उनकी यह दिव्य झाँकी पाकर भगीरथने बार-बार उन्हें प्रणाम किया और स्तुति भी की। लीलापूर्वक उन्हें भगवान्‌से अभीष्ट वर भी मिल गया। वे चाहते थे कि मेरे पूर्वज तर जायँ। परम आनन्दके साथ उन्होंने भगवान्‌की दिव्य स्तुति की थी।

भगवान् श्रीहरिने गङ्गाजीसे कहा—सुरेश्वरि! तुम सरस्वतीके शापसे अभी भारतवर्षमें जाओ और मेरी आज्ञाके अनुसार सगरके सभी पुत्रोंको पवित्र करो। तुमसे स्पर्शित वायुका संयोग पाकर ही वे सभी राजकुमार मेरे धाममें चले जायँगे। उनका भी विग्रह मेरे-जैसा ही हो जायगा और वे दिव्य रथपर सवार होंगे। उन्हें मेरे पार्षद होनेका सुअवसर प्राप्त होगा। वे सर्वदा आधि-व्याधिसे मुक्त रहेंगे। उनके जन्म-जन्मान्तरके पापोंकी समस्त पूँजी समाप्त हो जायगी। श्रुतिमें