ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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कहा गया है कि भारतवर्षमें मनुष्योंद्वारा उपार्जित करोड़ों जन्मोंके पाप गङ्गाकी वायुके स्पर्शमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। स्पर्श और दर्शनकी अपेक्षा गङ्गादेवीमें मौसलस्नान* करनेसे दसगुना पुण्य होता है। सामान्य दिनमें भी स्नान करनेसे मनुष्योंके अनेकों जन्मोंके पाप नष्ट हो जाते हैं। पर्वों तथा विशेष पुण्य-तिथियोंपर स्नान करनेका विशेष फल कहा गया है। सामान्यतः गङ्गामें स्नान करनेकी अपेक्षा चन्द्रग्रहणके अवसरपर स्नान करनेसे अनन्त गुना अधिक पुण्य कहा गया है। सूर्यग्रहणमें इससे दसगुना अधिक समझना चाहिये। इससे सौगुना पुण्य अर्धोदयके समय स्नान करनेसे मिलता है।
नारद! इस प्रकार गङ्गा और भगीरथके सामने कहकर देवेश्वर भगवान् श्रीहरि चुप हो गये। तब गङ्गाने भक्तिसे अत्यन्त नम्र होकर उनसे कहा।
**गङ्गा बोलीं—**नाथ! सरस्वतीका शाप पहलेसे ही मेरे सिरपर सवार है, आप आज्ञा दे ही रहे हैं और इन महाराज भगीरथकी एतदर्थ तपस्या भी हो रही है, अतः मैं अभी भारतवर्षमें जा रही हूँ; परंतु प्रभो! वहाँ जानेपर अनेकों पापीजन अपने जिस-किसी प्रकारके भी पापको मुझपर लाद देंगे। ऐसी स्थितिमें मेरे ऊपर आये हुए वे पाप कैसे नष्ट होंगे—इसका उपाय तो बतला दीजिये। देवेश! मुझे भारतवर्षमें कितने वर्षोंतक रहना पड़ेगा? फिर मैं कब आप परम प्रभुके धाममें आनेकी अधिकारिणी बन सकूँगी? प्रभो! आप सर्वान्तर्यामीसे कोई भी बात छिपी नहीं है। सर्वज्ञ देव! मेरे अन्तःकरणमें अन्य भी जो-जो कामनाएँ छिपी हैं, उनके भी पूर्ण होनेका उपाय बतानेकी कृपा करें।
**श्रीभगवान् बोले—**सुरेश्वरि! गङ्गे! मैं तुम्हारे सभी अभिप्रायोंसे परिचित हूँ। तुम नदी-रूपसे भारतवर्षमें पधारोगी और मेरे ही अंश-स्वरूप समुद्र तुम्हारे पति होंगे। भारतवर्षमें सरस्वती आदि अन्य जितनी नदियाँ होंगी, उन सबमें समुद्रके लिये तुम ही सबसे अधिक सौभाग्यवती मानी जाओगी। देवेशि! कलियुगके पाँच हजार वर्षोंतक तुम्हें सरस्वतीके शापसे भारतवर्षमें रहना है। देवि! लक्ष्मीरूपा तुम रसिका हो और मेरे स्वरूप समुद्र रसिकराज हैं। तुम उनके साथ एकान्तमें निरन्तर प्रियसंगम करोगी। भारतवासी सम्पूर्ण मनुष्य भगीरथप्रणीत स्तोत्रसे तुम्हारी स्तुति करेंगे और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक तुम सुपूजित भी होओगी। कण्वशाखामें बताये गये प्रकारसे तुम्हारा ध्यान करके लोग तुम्हारी पूजामें तत्पर होंगे। जो तुम्हारी स्तुति और तुम्हें प्रणाम करेगा, उसको अश्वमेध-यज्ञका फल सुलभतासे प्राप्त होगा। चाहे सैकड़ों योजनकी दूरीपर क्यों न हो; किंतु जो 'गङ्गा-गङ्गा' इस नामका उच्चारण करके स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे छूटकर विष्णुलोकमें चला जाता है। हजारों पापी व्यक्तियोंके स्नानसे जो तुमपर पाप आ जायँगे, मेरे भक्तोंके स्पर्शमात्रसे ही उनकी सत्ता नष्ट हो जायगी। हजारों पापी प्राणियोंके शवका स्पर्श अवश्य ही पापका साधन है; किंतु मेरे मन्त्रका अनुष्ठान करनेवाले पुण्यात्मा भक्तपुरुष भी तो तुम्हारेमें स्नान करने आयेंगे। उनके स्नानसे तुम्हारा वह सारा पाप नष्ट हो जायगा। शुभे! पवित्र भारतवर्षमें ही तुम्हारा निवास होगा। उस पापमोचन स्थानपर सरस्वती आदि सभी श्रेष्ठ नदियाँ तुम्हारा साथ देंगी। जहाँ तुम्हारे गुणोंका कीर्तन होगा, वह स्थान तुरंत तीर्थ बन जायगा। तुम्हारे रजःकणका स्पर्शमात्र हो
* गङ्गाको प्रणाम करके प्रवेश करे और निश्चेष्ट होकर अर्थात् बिना हाथ-पैर हिलाये शान्तभावसे स्नान कर ले। इसे 'मौसलस्नान' कहते हैं।