ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १४५
जानेपर भी पापी पवित्र हो सकता है और उन रजःकणोंकी जितनी संख्या होती है, उतने वर्षोंतक वह देवीके लोकमें बसनेका अधिकारी माना जाता है।
देवी! जो भक्ति एवं ज्ञानसे सम्पन्न होकर मेरे नामका स्मरण करते हुए प्राण-त्याग करते हैं, वे सीधे मेरे परमधाममें जाते हैं और वहाँ पार्षद बनकर दीर्घकालतक निवास करते हैं। वे असंख्य प्राकृतिक प्रलय देख सकते हैं। मृत व्यक्तिका शव बड़े पुण्यके प्रभावसे ही तुम्हारे अंदर आ सकता है। जितने दिनोंतक उसकी एक-एक हड्डी तुम्हारेमें रहती है, उतने समयतक वह वैकुण्ठमें वास करता है। यदि कोई अज्ञानी व्यक्ति तुम्हारे जलका स्पर्श करके प्राण-त्याग करता है तो वह मेरी कृपासे सालोक्यपदका अधिकारी होता है। अथवा कोई कहीं भी मरे; यदि मरते समय जिस-किसी प्रकारसे भी तुम्हारे नामका स्मरण हो जाता है तो उसे मैं सालोक्य-पद प्रदान करता हूँ। ब्रह्माकी आयुपर्यन्त वह वहाँ रह सकता है। कोई तीर्थमें मरे या अतीर्थमें, तुम्हारे स्मरणके प्रभावसे सारूप्यपदका अधिकारी वह पुरुष, ऐसा शक्तिशाली बन जाता है कि वह त्रिलोकीको भी पवित्र कर सकता है। जिनके बान्धव मेरे भक्त हैं—वे चाहे पशु आदि ही क्यों न हों—वे सर्वोत्तम रत्ननिर्मित विमानपर सवार होकर गोलोकमें चले जाते हैं।
मुनिवर! इस प्रकार गङ्गासे कहकर भगवान् श्रीहरिने राजा भगीरथसे कहा—‘राजन्! तुम अभी इन गङ्गाकी स्तुति तथा भक्तिभावके साथ पूजा करो।’ तब भगीरथ भक्तिपूर्वक गङ्गाके स्तवन और पूजनमें संलग्न हो गये। कौथुमिशाखामें कहे हुए ध्यान और स्तोत्रसे उन्होंने गङ्गाकी पूजा सम्पन्न की। तदनन्तर उन्होंने परमप्रभु परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको बार-बार प्रणाम किया। इसके बाद भगीरथ और गङ्गाकी अभीष्ट स्थानकी ओर यात्रा आरम्भ हो गयी तथा भगवान् अन्तर्धान हो गये।
नारदने पूछा—वेदज्ञोंमें प्रमुख प्रभो! किस ध्यान-स्तोत्रसे तथा किस पूजा-क्रमसे राजा भगीरथने गङ्गाकी पूजा की? यह मुझे स्पष्ट बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! राजा भगीरथने नित्यक्रियाके पश्चात् स्नान किया। दो स्वच्छ वस्त्र धारण किये। तब इन्द्रियोंको नियन्त्रणमें रखकर भक्तिपूर्वक छः देवताओंकी पूजा की। वे छः देवता हैं—गणेश, सूर्य, अग्नि, विष्णु, शिव और भगवती शिवा। इन देवताओंका पूजन करनेपर वे गङ्गाजीकी पूजाके पूर्ण अधिकारी बन गये। नारद! विघ्न दूर होनेके लिये गणेशकी, आरोग्यताके लिये सूर्यकी, पवित्रताके लिये अग्निकी, मुक्ति-प्राप्तिके लिये विष्णुकी, ज्ञानके लिये ज्ञानेश्वर शिवकी तथा बुद्धिकी वृद्धिके लिये भगवती शिवाकी पूजा करना आवश्यक है। विद्वान् पुरुषको इन देवताओंकी पूजा सम्पन्न कर लेनेपर ही अन्य किसी पूजामें सफलता प्राप्त होती है। मुने! सुनो, इस प्रकारसे भगीरथने गङ्गाका ध्यान किया था।
भगवान् नारायण कहते हैं—नारद! यह ध्यान सम्पूर्ण पापोंको नष्ट कर देता है। गङ्गाका वर्ण श्वेत चम्पाके समान स्वच्छ है। ये समस्त पापोंका उच्छेद कर देती हैं। परब्रह्म पूर्णतम भगवान् श्रीकृष्णके श्रीविग्रहसे इनका प्राकट्य हुआ है। ये परम साध्वी और उन्हींके समान सुयोग्य हैं। वह्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र इनकी शोभा