ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 156, कुल 810 में से
संदर्भ में पढ़ें| १४६ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
|---|
बढ़ाते हैं। रत्नमय भूषणोंसे ये विभूषित हैं। इन आदरणीया देवीने शरत्पूर्णिमाके सैकड़ों चन्द्रमाओंकी स्वच्छ प्रतिभाको अपनेमें स्थान दे रखा है। ये सदा मुस्कराती रहती हैं। इनके तारुण्यमें कभी शिथिलता नहीं आती। ये शान्तस्वरूपिणी देवी भगवान् नारायणकी प्रिया हैं। सत्सौभाग्य कभी इनसे दूर नहीं हो सकता। इनके सिरपर सघन अलकावली है। मालतीके पुष्पोंकी माला इनकी शोभा बढ़ा रही है। इनके ललाटपर चन्दन-बिन्दुओंके साथ सिन्दूरकी बिन्दी है, जिससे उनका लालित्य बढ़ गया है। गण्डस्थलपर कस्तूरीसे पत्ररचना की गयी है, जो नाना प्रकारके चित्रोंसे सुशोभित है। इनके परम मनोहर दोनों होठ पके हुए बिम्बाफलकी लालिमाको तुच्छ कर रहे हैं। इनकी मनोहर दन्तपंक्तियोंके सामने मोतियोंकी लड़ी नगण्य समझी जाती है। इनके कटाक्षपूर्ण बाँकी चितवनसे युक्त नेत्र परम मनोहर हैं। इनका वक्षःस्थल विशाल है। स्थल-कमलकी प्रभाका पराभव करनेवाले दो सुन्दर चरण हैं। रत्नमय पादुकाओंसे शोभा पानेवाले उन चरणोंमें महावर लगा है। देवराज इन्द्रके मुकुटमें लगे हुए मन्दारके फूलोंके रजःकणसे इन देवीके श्रीचरणोंकी लालिमा गाढ़ी हो गयी है। देवता, सिद्ध और मुनीन्द्र अर्घ्य लेकर सदा सामने खड़े हैं। तपस्वियोंके मुकुटमें रहनेवाले भौंरोंकी पंक्तिसे इनके चरण संयुक्त हैं। इनके पावन चरण मुमुक्षुजनोंको मुक्ति देनेमें तथा कामी पुरुषोंकी कामना पूर्ण करनेमें अत्यन्त कुशल हैं। ये परमादरणीया देवी सबकी पूज्या, वर देनेमें प्रवीण, भक्तोंपर कृपा करनेमें परम कुशल, भगवान् विष्णुका पद प्रदान करनेवाली तथा विष्णुपदी नामसे सुविख्यात हैं। इन परम साध्वी गङ्गादेवीकी मैं उपासना करता हूँ।
ब्रह्मन्! इसी ध्यानसे तीन मार्गोंसे विचरण करनेवाली कल्याणी गङ्गाका हृदयमें स्मरण करना चाहिये। इसके बाद सोलह प्रकारके उपचारोंसे इनकी पूजा करे। आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, अनुलेपन, धूप, दीप, नैवेद्य, ताम्बूल, शीतल जल, वस्त्र, आभूषण, माला, चन्दन, आचमन और सुन्दर शय्या—ये अर्पण करनेके योग्य सोलह उपचार हैं। इन्हें भगवती गङ्गाको भक्तिपूर्वक समर्पण करके प्रणाम करे और दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करे। इस प्रकार गङ्गादेवीकी उपासना करनेवाले बड़भागी पुरुषको अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इसके बाद श्रीगङ्गाजीका परम पुण्यदायक और पापनाशक स्तोत्र सुनाकर फिर भगवान् नारायणने कहा।
**भगवान् नारायण बोले—**नारद! राजा भगीरथ उस स्तोत्रसे गङ्गाकी स्तुति करके उन्हें साथ ले वहाँ पहुंचे, जहाँ सगरके साठ हजार पुत्र जलकर भस्म हो गये थे। गङ्गाका स्पर्श करके बहनेवाली वायुका स्पर्श होते ही वे राजकुमार तुरंत वैकुण्ठमें चले गये।
भगीरथके सत्प्रयत्नसे गङ्गाका आगमन हुआ है। अतः गङ्गाको ‘भागीरथी’ कहते हैं। यों गङ्गाका सम्पूर्ण उत्तम उपाख्यान कह दिया। यह उपाख्यान पुण्यदायी तथा मोक्षका साधन है। अब आगे तुम और क्या सुनना चाहते हो?