ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकृतिखण्ड १४९
श्रीराधाजीका गङ्गापर रोष, श्रीकृष्णके प्रति राधाका उपालम्भ, श्रीराधाके भयसे गङ्गाका श्रीकृष्णके चरणोंमें छिप जाना, जलाभावसे पीड़ित देवताओंका गोलोकमें जाना, ब्रह्माजीकी स्तुतिसे राधाका प्रसन्न होना तथा गङ्गाका प्रकट होना, देवताओंके प्रति श्रीकृष्णका आदेश तथा गङ्गाके विष्णुपत्नी होनेका प्रसङ्ग
नारदजीने पूछा— सुरेश्वर! कलिके पाँच हजार वर्ष बीत जानेपर गङ्गाका कहाँ जाना होगा? महाभाग! यह प्रसङ्ग मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायणने कहा— नारद! सरस्वतीके शापसे गङ्गा भारतवर्षमें आयीं। शापकी अवधि पूरी हो जानेपर वह पुनः भगवान् श्रीहरिकी आज्ञासे वैकुण्ठमें चली जायेंगी। ऐसे ही सरस्वती भारतवर्षको छोड़कर श्रीहरिके धाममें पधारेंगी। शाप समाप्त हो जानेपर लक्ष्मीका भी भगवान्के पास पधारना होगा। नारद! ये ही गङ्गा, सरस्वती और लक्ष्मी भगवान् श्रीहरिकी प्रेयसी पत्नियाँ हैं। ब्रह्मन्! तुलसीसहित चार पत्नियाँ वेदोंमें प्रसिद्ध हैं।
नारदजीने पूछा— भगवन्! भगवान् श्रीहरिके चरणकमलोंसे प्रकट हुई गङ्गादेवी किस प्रकार परब्रह्मके कमण्डलुमें रहीं तथा शंकरकी प्रिया होनेका सुअवसर उन्हें कैसे मिला? मुनिवर! गङ्गा भगवान् नारायणकी प्रेयसी भी हो चुकी हैं। अहो! किस प्रकार ये सभी बातें संघटित हुईं? आप यह रहस्य मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।
भगवान् नारायणने कहा— नारद! पूर्वकालमें जलमयी गङ्गा गोलोकमें विराजमान थीं। राधा और श्रीकृष्णके अङ्गसे प्रकट हुई यह गङ्गा उनका अंश तथा उन्हींका स्वरूप हैं। द्रवकी अधिष्ठात्री देवीके रूपमें अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके भूमण्डलपर पधारीं। उस समय भूमण्डलमें उनके रूप-लावण्यकी कहीं तुलना नहीं थी। उनका शरीर नूतन यौवनसे सम्पन्न था। उनके सभी अङ्ग रत्नमय अलंकारोंसे अलंकृत थे। शरद्-ऋतुके मध्याह्नकालमें खिले हुए कमलकी भाँति उनका मुस्कानभरा मुख परम मनोहर था। उनकी आभा तपाये हुए सुवर्णके सदृश थी। तेजमें वह शरत्कालके चन्द्रमाको भी परास्त कर रही थीं। मनोहरसे भी मनोहर उनकी कान्ति थी। उन्होंने शुद्ध सात्त्विक स्वरूप धारण कर रखा था। विशाल दो नेत्र अनुपम शोभा बढ़ा रहे थे। अत्यन्त कटाक्षपूर्ण दृष्टिसे वे देख रही थीं। सुन्दर अलकावली शोभा बढ़ा रही थी। उसमें उन्होंने मालतीके पुष्पोंका मनोहर हार लगा रखा था। ललाटपर चन्दन-बिन्दुओंके साथ सिन्दूरकी सुन्दर बिंदी थी। दोनों मनोहर गण्डस्थलोंपर कस्तूरीसे पत्ररचनाएँ हुई थीं। नीचे उनका अधर-ओष्ठ इतना सुन्दर था मानो दुपहरियाका विकसित फूल हो। दाँतोंकी अत्यन्त उज्ज्वल पंक्ति पके हुए अनारके दानोंकी भाँति चमक रही थी। अग्नि-शुद्ध दो दिव्य वस्त्रोंको उन्होंने धारण कर रखा था। ऐसी वे गङ्गा लज्जाका भाव प्रदर्शित करती हुई भगवान् श्रीकृष्णके पास विराजमान हो गयीं। वे अञ्चलसे अपना मुँह ढककर निर्निमेष नेत्रोंसे भगवान्के मुखरूपी अमृतका निरन्तर प्रसन्नतापूर्वक पान कर रही थीं। उनका मुखमण्डल प्रसन्नतासे खिल रहा था। भगवान् श्रीकृष्णके रूपने उन्हें बेसुध तथा अत्यन्त पुलकायमान बना दिया था।
इतनेमें भगवती राधिका वहाँ पधारकर विराजमान हो गयीं। उस समय राधाके साथ असंख्य गोपियाँ थीं। राधाकी कान्ति ऐसी थी मानो करोड़ों चन्द्रमाओंकी ज्योत्स्ना एक साथ